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मीडिया है तो लोकतंत्र है, मीडिया नहीं तो लोकतंत्र अधूरा – डिजिटल युग में पत्रकारिता की ताकत और चुनौती – एके बिंदुसार

*मीडिया है तो लोकतंत्र है, मीडिया नहीं तो लोकतंत्र अधूरा – डिजिटल युग में पत्रकारिता की ताकत और चुनौती – एके बिंदुसार*

 

लोकतंत्र में और इस आधुनिक युग में मीडिया के महत्व पर प्रकाश डालते हुए भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि मीडिया केवल खबर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है।

 

जब तक कलम जिंदा है,

तब तक लोकतंत्र जिंदा है

 

लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं – विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। तीन स्तंभ कानून बनाते हैं, लागू करते हैं और न्याय देते हैं, लेकिन चौथा स्तंभ यानी मीडिया यह तय करता है कि वह न्याय जनता तक पहुंच रहा है या नहीं।

 

ब्रिटिश हुकूमत में जब अखबारों पर प्रतिबंध था, तब भी मीडिया ने क्रांति की अलख जगाई थी। आज जब देश आजाद है, तो मीडिया की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। यदि मीडिया कमजोर हुआ तो लोकतंत्र की हत्या निश्चित है। इसलिए कहा जाता है – मीडिया है तो लोकतंत्र है।

 

आधुनिक युग – हर हाथ में माइक, हर जेब में चैनल

 

पहले खबर को आने में दिन लगते थे, आज सेकंड लगते हैं। प्रिंट से शुरू हुआ सफर आज डिजिटल, यूट्यूब, पोर्टल, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप तक पहुंच गया है।

 

आधुनिक युग में मीडिया की ताकत परमाणु बम से भी तेज हो गई है। एक खबर से सरकारें गिर जाती हैं और एक खबर से किसी गरीब को न्याय मिल जाता है। आज हर व्यक्ति पत्रकार है, लेकिन सच्चा पत्रकार वही है जो खबर की पुष्टि करता है, अफवाह नहीं फैलाता। भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी इसी सच्ची पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए बना है।

 

फेक न्यूज के दौर में असली पत्रकार की पहचान

 

आज मीडिया के सामने दो रास्ते हैं – एक टीआरपी और पैसे का, दूसरा सच और संघर्ष का। बहुत से चैनल बिक गए, बहुत सी कलमें झुक गईं, लेकिन आज भी ईमानदार पत्रकारों की कमी नहीं है।

 

आधुनिक युग में पत्रकार को चाहिए कि वह –

सत्ता से सवाल पूछे, विपक्ष की भी कमियों को उजागर करे, गरीब की झोपड़ी तक जाए और एसी वाले दफ्तरों का सच भी दिखाए। सोशल मीडिया पर वायरल झूठ को रोकना भी आज पत्रकार का धर्म है।

: पत्रकार सुरक्षा कानून क्यों जरूरी है?

 

एके बिंदुसार ने कहा कि आज देश में पत्रकार सबसे असुरक्षित है। खबर लिखने पर उसकी हत्या कर दी जाती है, फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है, जैसा कि मिर्जापुर के विजेंद्र बहादुर सिंह के मामले में हुआ। एससी-एसटी जैसे गंभीर धाराओं में फंसा कर कलम को खामोश करने की कोशिश की जा रही है।

 

इसलिए भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल की मांग है कि –

 

1. केंद्र सरकार अविलंब पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करे।

2. पत्रकारों पर हमला करने वालों पर गैर-जमानती धारा लगे और फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो।

3. फर्जी मुकदमों की जांच एसपी स्तर के अधिकारी से कराई जाए।

4. मृतक पत्रकार के परिवार को 50 लाख का मुआवजा और सरकारी नौकरी मिले।

5. पत्रकारों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस और पेंशन योजना लागू हो।

जब तक कानून नहीं बनेगा, तब तक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सुरक्षित नहीं होगा।

 

* 2 : पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जनगणना क्यों जरूरी है?

 

एके बिंदुसार ने कहा कि सरकार के पास किसानों की, मजदूरों की, शिक्षकों की जनगणना है, लेकिन पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कोई जनगणना नहीं है।

 

आज गली-गली में लोग पत्रकार बन गए हैं, लेकिन असली और फर्जी की पहचान कैसे होगी? इसलिए भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की मांग करता है –

 

. केंद्र और राज्य सरकारें पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जनगणना कराए।

. हर जिले में प्रेस काउंसिल की तरह सत्यापन समिति बने।

. जनगणना के आधार पर ही अधिमान्यता, रेल-बस पास, टोल टैक्स में छूट, आवास योजना और सुरक्षा दी जाए।

. जो 5 साल से अधिक से निस्वार्थ समाज सेवा कर रहा है, उसे सामाजिक कार्यकर्ता का दर्जा दिया जाए।

जनगणना से ही पता चलेगा कि देश में कितने पत्रकार हैं, उनकी आर्थिक स्थिति क्या है और उन्हें क्या चाहिए।

 

– : लोकतंत्र में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिस्सेदारी का पैमाना।

 

एके बिंदुसार ने लोकतंत्र में हिस्सेदारी का एक स्पष्ट पैमाना भी तय किया है –

 

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी का फॉर्मूला है – *हर योजना में 5 प्रतिशत हिस्सेदारी।*

 

1. *राजनीति में हिस्सेदारी:* हर पार्टी अपने टिकटों में कम से कम 5% टिकट ईमानदार पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दे, क्योंकि वे जमीन से जुड़े होते हैं।

2. *सदन और समितियों में हिस्सेदारी:* जिला विकास समिति, थानो की शांति समिति, अस्पताल और शिक्षा समितियों में 5% स्थान पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिया जाए।

3. *बजट में हिस्सेदारी:* केंद्र और राज्य बजट में मीडिया कल्याण और सामाजिक कार्यकर्ता कल्याण के लिए अलग से 5% बजट का प्रावधान हो।

4. *सम्मान में हिस्सेदारी:* पद्मश्री, पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय पुरस्कारों में ग्रामीण पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को 5% आरक्षण मिले।

जब तक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता को लोकतंत्र में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं आएगा।

 

*आइए, कलम को हथियार बनाएं*

 

एके बिंदुसार ने कहा कि भारतीय मीडिया फाउंडेशन का लक्ष्य पत्रकारों को एक मंच पर लाकर उन्हें सुरक्षा, सम्मान और रोजगार देना है। हम चाहते हैं कि पत्रकार डरे नहीं, बिके नहीं, बल्कि निष्पक्ष होकर लिखे।

 

याद रखिए, तलवार का घाव भर जाता है, लेकिन कलम का घाव कभी नहीं भरता। आइए, हम सब मिलकर इस आधुनिक युग में मीडिया को और अधिक सशक्त, स्वतंत्र और जन-उन्मुख बनाएं, क्योंकि मीडिया बचेगा तो ही लोकतंत्र बचेगा।

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