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बेंच पर दम तोड़ती प्रतिभाएं और ओलंपिक का नया सवेरा – क्या भारतीय क्रिकेट को स्वतंत्र राष्ट्रीय चयन की दरकार है?

बेंच पर दम तोड़ती प्रतिभाएं और ओलंपिक का नया सवेरा – क्या भारतीय क्रिकेट को स्वतंत्र राष्ट्रीय चयन की दरकार है?

 

शंकर देव तिवारी

हाल के वर्षों में भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) के चयन ढाँचे और खिलाड़ियों के करियर प्रबंधन को लेकर कई गंभीर सवाल उठते रहे हैं। एक कड़वा सच यह है कि भारतीय क्रिकेट का इतिहास ऐसे गेंदबाजों से भरा पड़ा है, जिन्हें उनके सर्वश्रेष्ठ दौर में भी पर्याप्त मौके नहीं मिले और उन्होंने बिना विदाई मैच खेले चुपचाप खेल को अलविदा कह दिया। करुण नायर जैसे बल्लेबाजों का उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में तिहरा शतक (303*) लगाने के बावजूद टीम में अपनी जगह स्थायी नहीं कर पाई और धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। दूसरी ओर, कई बड़े बल्लेबाजों को फॉर्म से बाहर होने के बावजूद उनके रसूख के कारण लंबे समय तक मैदान पर खींचते देखा गया है, जिससे युवाओं के रास्ते बंद हुए।

आज यही स्थिति वैभव सूर्यवंशी जैसे उभरते हुए होनहार खिलाड़ियों के साथ होने का अंदेशा है। वैभव ने बेहद कम उम्र में अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से सबको प्रभावित किया है, लेकिन यदि ऐसे खिलाड़ियों को उनके करियर के सबसे ऊर्जावान और स्वर्णिम समय (Peak Form) में भारतीय बेंच पर बिठाकर समय निकाला गया, तो यह खेल विज्ञान और खिलाड़ी की शारीरिक क्षमता दोनों के साथ खिलवाड़ होगा। एक एथलीट का शरीर हमेशा एक जैसी रफ्तार और लचीलापन नहीं रख सकता; जो काम आज उनका शरीर कर पा रहा है, जरूरी नहीं कि वह तीन साल बाद भी उसी सहजता से कर पाए।

प्रतिभाओं के इस अति-प्रवाह और अवसरों की कमी का नतीजा यह है कि आज वैश्विक क्रिकेट के मानचित्र पर भारतीय खिलाड़ियों की दूसरी खेप दूसरे देशों को मजबूत कर रही है। उन्मुक्त चंद (पूर्व भारतीय अंडर-19 विश्व कप विजेता कप्तान), स्मित पटेल और हरमीत सिंह जैसे खिलाड़ियों को भारत में अवसर न मिलने के कारण अमेरिका (USA) का रुख करना पड़ा। हालिया टी20 विश्व कप में अमेरिकी टीम की रीढ़ सौरभ नेत्रवलकर रहे, जो कभी भारत की अंडर-19 टीम में खेल चुके थे। नीदरलैंड्स की टीम में विक्रमजीत सिंह और ओमान, यूएई जैसे देशों की अंतरराष्ट्रीय टीमों में भारतीय मूल के खिलाड़ियों की भरमार यह साबित करती है कि भारत के पास इतनी प्रतिभा है कि उससे कई देशों की विश्व स्तरीय टीमें खड़ी की जा सकती हैं।

अब जबकि क्रिकेट को आधिकारिक तौर पर लॉस एंजिल्स ओलंपिक (LA28) में शामिल कर लिया गया है, तब खेल का स्वरूप पूरी तरह बदलने वाला है। ओलंपिक का सीधा संबंध बोर्ड की व्यावसायिक नीतियों से नहीं, बल्कि देश के राष्ट्रीय गौरव और खेल मंत्रालय के नियमों से होता है। ऐसे में समय की मांग है कि क्या बीसीसीआई के एकाधिकार से हटकर, सीधे भारत सरकार या भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के तत्वावधान में एक स्वतंत्र ‘राष्ट्रीय क्रिकेट चयन समिति’ का गठन किया जाए?

ओलंपिक जैसे वैश्विक महाकुंभ में पदक जीतने के लिए देश को अपनी सर्वश्रेष्ठ और सबसे इन-फॉर्म (In-form) प्रतिभाओं को मैदान पर उतारना होगा, न कि सिर्फ स्थापित नामों के भरोसे बैठना होगा। यदि देश में एक वैकल्पिक राष्ट्रीय टीम की व्यवस्था बनती है, तो वैभव जैसे सैकड़ों प्रतिभावान युवाओं को अपने देश की जर्सी पहनकर वैश्विक मंच पर चमकने का हक मिलेगा। यह संपादकीय खेल के इस नए युग में एक देश, स्वतंत्र चयन और हर वास्तविक हकदार को मैदान देने के अभियान की पुरजोर वकालत करता है।

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