प्रमोशन या जबरदस्त डिमोशन मात्र चार लाख से भी कम आबादी वाले राज्य अंडमान निकोबार का उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा को बनाया गया है। अंडमान-निकोबार की कुल आबादी 4 लाख से भी कम है। अब जरा तुलना देखिए— डॉ. दिनेश शर्मा जी लखनऊ के मेयर रह चुके हैं। लखनऊ नगर निगम 8 जोनों में बंटा है और एक-एक जोन की आबादी लगभग 5 लाख के आसपास है। यानी जिस शहर के एक जोन में अंडमान-निकोबार से ज्यादा लोग रहते हैं, उस पूरे लखनऊ की लगभग 45–50 लाख आबादी की जिम्मेदारी संभाल चुके शर्मा जी को अब 4 लाख से कम आबादी वाले केंद्रशासित प्रदेश की जिम्मेदारी मिली है।
इसके बाद 2017 में इन्हें देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया फिर इनकी अद्भुत नेतृत्व क्षमता को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी देने के लिए राज्यसभा भेजा गया।
अब शायद राज्यसभा की सीट खाली करवानी थी, लेकिन देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में शर्मा जी को बिल्कुल कुछ न देकर घर बैठा देना भी थोड़ा ज्यादा कठोर संदेश देता। इसलिए अंततः ‘लोलीपॉप’ के रूप में उपराज्यपाल का पद दे दिया गया। और वैसे भी, प्रशासनिक अनुभव के मामले में शर्मा जी का अपना एक विशिष्ट अंदाज रहा है ये भी लोलीपॉप देने मे माहिर रहे हैं कहा जाता है कि मंत्री रहते हुए फाइलों पर बहुत स्पष्ट आदेश देने से वे हमेशा बचते थे। उनका सर्वकालिक, सर्वव्यापी और सर्वसुरक्षित आदेश हुआ करता था—
#नियमानुसार_कार्यवाही_कर_सूचित_करें
अब अंडमान-निकोबार में फिर यही लाइन लिखने के काम आएगी क्योंकि वहां भी असली निर्णय तो गृह मंत्रालय ही लेगा।
बस फर्क इतना है कि पहले फाइल पर लिखते थे—
“नियमानुसार कार्यवाही कर सूचित करें।” अब शायद गृह मंत्रालय की ओर देखकर लिखना होगा—
“नियमानुसार जो करना हो, करिए और मुझे भी सूचित करिए।”
खैर, निपटा दिए गए।
विडंबना यह है कि जिन्हें कभी ‘ब्राह्मण शिरोमणि’ बताकर सत्ता के बड़े पदों पर बैठाया गया, उन्होंने ब्राह्मण समाज को वर्षों तक नियम, प्रक्रिया और अनुशासन की घुट्टी पिलाई।अब लगता है, उसी नियम-कायदे की नीम की गोली इनको भी चखाई जा रही है।
मजेदार बात यह है कि आज बहुत से ब्राह्मण इनके पद घटने पर दुखी होने के बजाय इस बात पर ज्यादा चिंतित हैं कि—“भाई, उपराज्यपाल ही क्यों बनाया?
घर ही बैठा देते तो ज्यादा अच्छा था!”
सियासत भी बड़ी अजीब चीज है।
जब तक कुर्सी बड़ी हो—
नेतृत्व क्षमता अद्भुत।
कुर्सी छोटी हो जाए—
राष्ट्रीय जिम्मेदारी।
और जब जिम्मेदारी ऐसी जगह मिले जहां असली फैसले कोई और करे—तो समझिए राजनीतिक भाषा में इसे कहते हैं—सम्मानपूर्वक किनारे लगाना
















