प्रतिभा की उपेक्षा और खेल व्यवस्था की जवाबदेही
शंकर देव tivari
किसी भी देश में जब हुनर और योग्यता को सही समय पर सही मंच नहीं मिलता, तो खेल प्रेमियों का देश की खेल व्यवस्था और चयन प्रणाली से विश्वास उठना स्वाभाविक है। वर्तमान में क्रिकेट के गलियारों से आ रही खबरें कुछ इसी ओर इशारा करती हैं। युवा और बेमिसाल प्रतिभाओं—जैसे कि वैभव—को जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी काबिलियत साबित करने के पर्याप्त मौके नहीं मिल रहे हैं, उसने चयन प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब खेल के मैदान पर सीनियर खिलाड़ियों द्वारा अपनी जगह सुरक्षित रखने की होड़ में युवा प्रतिभाओं को दरकिनार किया जाता है, तो यह केवल एक खिलाड़ी का नहीं बल्कि पूरे देश के खेल भविष्य का नुकसान है। लगातार बेंच पर बैठे रहने से किसी भी खिलाड़ी की धार कुंद हो सकती है, और ऐसे में अगर कोई हताश होकर अपने भविष्य के लिए कड़े कदम उठाने को मजबूर हो, तो दोष व्यवस्था का ही होगा।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर भारतीय क्रिकेट के प्रशासनिक ढांचे की बहस को हवा दे दी है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जिसे हम ‘टीम इंडिया’ कहते हैं, वह तकनीकी रूप से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की टीम है, जो एक निजी तौर पर गठित संस्था है। सरकार का इस पर सीधा नियंत्रण न होना और बोर्ड की निरंकुशता, अक्सर ऐसी प्रतिभाओं के लिए मार्ग अवरुद्ध करती है। इतिहास गवाह है कि इंग्लैंड में भी कभी मेरिलबोन क्रिकेट क्लब (MCC) के नाम से टीम खेला करती थी। लेकिन जब वहां प्रतिभाओं की उपेक्षा और आंतरिक राजनीति के मामले बढ़े, तो व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव किए गए ताकि देश की प्रतिभा का पलायन न हो और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा जा सके।
समय आ गया है कि भारतीय क्रिकेट में भी एक पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत चयन प्रणाली की नींव रखी जाए। खेल को किसी एक बोर्ड या चंद रसूखदार लोगों की जागीर बनने से बचाना होगा। अगर समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया और वैभव जैसी असाधारण प्रतिभाओं को जंग लगने के लिए छोड़ दिया गया, तो भारतीय क्रिकेट को अपूरणीय क्षति झेलनी पड़ सकती है। खेल का विकास केवल अरबों रुपये की कमाई से नहीं, बल्कि मैदान पर सही प्रतिभा को सही समय पर मौका देने से होता है।














