विशेषांक आलेख:
आज़ादी की आड़, लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों का छलावा
शंकर देव तिवारी
“””””बात अगर सच्ची सुनोगे, तभी कुछ सोचोगे।……
यह पंक्तियाँ केवल एक रचना की शुरुआत नहीं, बल्कि समकालीन भारत के उस अंतःकरण की आवाज़ हैं, जो व्यवस्था के भीतर पनप रही अघोषित ‘हिटलरी’ और तानाशाही प्रवृत्तियों पर मंथन करने को मजबूर है।
हम सब गर्व से कहते हैं कि हम महान भारत देश के निवासी हैं। लेकिन आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि आख़िर आज़ादी के इतने दशकों बाद भी हम आंतरिक रूप से टुकड़ों में क्यों बंटे हुए हैं? हम एक संपूर्ण राष्ट्र के रूप में वैचारिक और सामाजिक तौर पर एक क्यों नहीं हो पाए? विडंबना देखिए कि आज भी आम नागरिक की मौलिक पहचान असमंजस के भंवर में है। जिस आम जनता को अपने मौलिक अधिकारों का रक्षक होना चाहिए था, वह आज भी अपने बुनियादी हकों से अनभिज्ञ है। अमीर और गरीब (राजा और रंक) के बीच की खाई पाटने का दम भरने वाला हमारा लोकतंत्र, आज बिना वास्तविक अधिकारों के एक ढांचा मात्र बनकर रह गया है।
सच तो यह है कि आरक्षण की राजनीति और निरंकुश आज़ादी की आड़ में आज जन-तंत्र (लोक-तंत्र) को सत्ता के गलियारों में गिरवी रख दिया गया है। जो शेष भारत बचा था, उसे पूरी तरह से स्वार्थी राजनीति के रंग में रंग दिया गया है। हमारे नीति-निर्माताओं ने कभी इस देश को स्वर्ग बनाने की कल्पना के साथ नियम और संविधान गढ़े थे। लेकिन आचरण में उन नियमों को भुलाकर जनता को नर्क जैसी विसंगतियों में ढकेल दिया गया, जबकि सत्ता की मलाई चाटने वाले हुक्मरान खुद को ‘देवता’ मानकर वातानुकूलित महलों में बस गए।
इतिहास गवाह है कि यहाँ आदमी ने कभी दूसरे आदमी को इंसानियत के नाते खुलकर जीने और पनपने नहीं दिया। रही-सही कसर राजनीति ने पूरी कर दी, जो अब जननीति न रहकर ‘कालनीति’ बन चुकी है। इस कालनीति ने समाज में कभी कोई नेक काम अमली जामा नहीं पहनने दिया।
आज की शासन व्यवस्था का अघोषित नारा यही बन चुका है कि ‘आज़ादी की आड़ में जनता जाए भाड़ में’। नीतियां जनहित के नाम पर बनती हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल राजनीति की आड़ में खुद के हित साधने के लिए होता है। सरकारें पूरे दंभ और शान से चल रही हैं, जबकि जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली विधायिका जैसे हाशिए पर डाल दी गई है। लोकतंत्र के इस आवरण में आज आम जनता की पुकार सुनने वाला कोई नहीं है।
आज हिंदुस्तान में ‘मौलिक अधिकारों’ की बातें करना महज़ एक छलावा और धोखा प्रतीत होता है। यह आलेख इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करते हुए एक विशेष मिशन की ओर इशारा करता है—नैतिकता के पुनरुत्थान का मिशन। जब तक देश का आम नागरिक राजनीति के इस छलावे को नहीं समझेगा और अपने नैतिक दायित्वों को पहचानकर एकजुट नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र का असली सूरज नहीं उगेगा। अब समय आ गया है कि हम इस ‘राजनीतिक कालनीति’ के ख़िलाफ़ अपनी सामूहिक चेतना को जगाएं।














