राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?* *(आलेख : मालिनी भट्टाचार्य, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)

 

 

*राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?*

*(आलेख : मालिनी भट्टाचार्य, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*

 

विगत 20 जुलाई की आधी रात को, कुछ ‘अज्ञात बदमाशों’ ने पश्चिम बंगाल के औद्योगिक शहर रानीगंज के एक मुख्य चौराहे पर लगी राहुल सांकृत्यायन की आदमकद मूर्ति को गायब कर दिया। सुबह वहां बिखरी हुई ईंटों और पत्थरों के अलावा कुछ नहीं बचा था। हैरान निवासियों ने तुरंत पास के पुलिस स्टेशन में इसकी सूचना दी थी, लेकिन तब से आज तक पुलिस एक भी दोषी की पहचान नहीं कर पाई है। आप इसे पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार के दौर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर एक तीखी टिप्पणी मान सकते हैं कि स्थानीय प्रशासन ने इस मामले पर कोई ध्यान नहीं दिया ; न तो मुख्यमंत्री और न ही किसी स्थानीय सांसद/विधायक ने कोई चिंता जताई, घटना की निंदा की या नुकसान की भरपाई का प्रस्ताव दिया। लेकिन भाजपा के कुछ गुंडों ने आकर स्थानीय सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी जरूर दी, क्योंकि उन्होंने कई चिंतित निवासियों के साथ मिलकर तोड़-फोड़ की निंदा करने के लिए उस जगह पर एक विरोध सभा का आयोजन किया था।

 

ऐसा व्यवहार कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि नई सरकार की शुरुआत ही गांधीजी और लेनिन की मूर्तियों को नुकसान पहुँचाने और बंगाल में 1860 के दशक के ‘नील विद्रोह’ से जुड़ी एक कलाकृति को तोड़ने से हुई थी। भाजपा के सत्ता में आने से कुछ साल पहले भी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ झड़प के दौरान, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम पर बने कॉलेज के कैंपस में बनी उनकी ही प्रतिमा को तोड़ दिया था। अब जब वे सत्ता में हैं, तो वे निश्चित रूप से उन सार्वजनिक प्रतीकों को नष्ट करके उन सभी जगहों पर कब्ज़ा करने की कोशिश करेंगे, जो किसी दूसरी विचारधारा या प्रभाव को दर्शाते हैं। अगला कदम होगा, जैसा कि सभी फासीवादी ताकतों के मामले में होता है, इतिहास की इन खाली जगहों को अपनी पसंद के प्रतीकों से भरना, और स्थानीय स्तर पर इतिहास को फिर से लिखना, ठीक वैसे ही जैसे वे राष्ट्रीय स्तर पर कर रहे हैं।

 

बहरहाल, रानीगंज क्रॉसिंग पर लगी राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति का अपना एक खास इतिहास है। कभी-कभी यह शिकायत की जाती है — और शायद यह शिकायत सही भी है — कि राहुल सांकृत्यायन जैसे असाधारण विद्वान, बुद्धिजीवी और आज़ादी की लड़ाई के कार्यकर्ता को इतिहास में उतनी जगह नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। बहरहाल, 1993 में उनकी जन्मशती के वर्ष के अवसर पर पश्चिम बंगाल में उनके जीवन और काम का स्मरण करने और उनके योगदान का सही मूल्यांकन करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। कोयला क्षेत्र और बड़ी औद्योगिक आबादी वाले रानीगंज में, कई मज़दूर नेताओं ने प्रगतिशील लेखकों, कलाकारों और शिक्षकों के साथ मिलकर उनकी जन्मशती मनाने के लिए साल भर चलने वाला कार्यक्रम आयोजित किया था। इसका मकसद राहुल की भूमिका को सिर्फ़ एक असाधारण विद्वान, दार्शनिक और भाषाविद् के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक जन-नेता और लोगों के बीच घूमने-फिरने वाले एक ऐसे घुमक्कड़ के रूप में भी सामने लाना था, जिन्होंने समाज में लोगों के शोषण और दमन की गहराई को समझने और सामाजिक मुक्ति का रास्ता खोजने की लगातार कोशिश की। इन्हीं खोजों की वजह से वे बौद्ध दर्शन के भौतिकवादी पहलुओं और करुणा के सिद्धांत से जुड़े, और फिर ऐतिहासिक भौतिकवाद और मार्क्सवादी सिद्धांत पर शोध किया, जिसे उन्होंने भारतीय परिस्थितियों में लागू करने की कोशिश की।

 

रानीगंज की टीम ने राहुल के जीवन और उनके कामों से जुड़ी इन्हीं बातों पर प्रकाश डालने की कोशिश की। उनकी गतिविधियों में मज़दूरों के मोहल्लों और किसानों के समूहों के साथ बैठकें और चर्चा के सत्र आयोजित करने की योजना शामिल थी। इस तरह, इन कार्यक्रमों का मकसद राहुल के जीवन और उनके कामों की अहमियत को मेहनतकश लोगों के बीच लोकप्रिय बनाना था। शताब्दी वर्ष के आखिर में, 1994 में जब योजना के मुताबिक रानीगंज चौराहे पर उनकी मूर्ति लगाई गई, तो किसान आंदोलन के वरिष्ठ नेता और उस समय वाम मोर्चा सरकार में मंत्री रहे बिनॉयकृष्ण चौधरी ने इसका अनावरण किया ; इस मौके पर राहुल का परिवार और कई गणमान्य व्यक्ति, लेखक और बुद्धिजीवी मौजूद थे। लेकिन उनके साथ-साथ आम मेहनतकश लोगों की भी भारी भीड़ वहां जमा हुई थी, क्योंकि यह कार्यक्रम उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। तब से, हर साल 9 अप्रैल को राहुल का जन्मदिन उसी जगह पर ‘पश्चिमबंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ’ द्वारा मनाया जाता है।

 

राहुल का जन्म के समय का नाम केदारनाथ पांडे था और वे बिहार के एक दूर-दराज़ के एक गाँव पंडहा में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में आज़ादी की लड़ाई के फैलने के साथ जो सामाजिक बदलाव आए, उसने उन्हें भी प्रभावित किया और उनके तेज़ और जिज्ञासु दिमाग को अपने आस-पास की बदलती दुनिया को लगातार जानने और समझने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई सालों तक कई पारंपरिक संस्थानों से जुड़कर ज्ञान हासिल किया ; हालाँकि उन्हें कभी भी ‘आधुनिक’ शिक्षण संस्थानों से कोई डिग्री नहीं मिली, लेकिन यह बात कभी भी ज्ञान की उनकी ज़बरदस्त चाहत में रुकावट नहीं बनी। यहाँ तक कि जब वे पारंपरिक शिक्षा प्रणालियों से गुज़रे, तब भी उन्होंने अपनी आलोचनात्मक सोच का इस्तेमाल किया और असहमति की परंपराओं से भी परिचित हुए। इस तरह, वे मुख्य रूप से एक आधुनिक व्यक्ति थे, जो उस दौर की उन हलचल भरी परिस्थितियों की उपज थे, जिसमें वे बड़े हुए थे। एक घूमते-फिरते बौद्ध विद्वान के तौर पर उन्होंने अपना नाम ‘राहुल सांकृत्यायन’ रखा और ज्ञान की खोज में तिब्बत, श्रीलंका और सोवियत रूस की यात्राओं के दौरान उन्हें काफ़ी शोहरत और सम्मान मिला। साथ ही, 1922 में गांधीवादी आंदोलन के एक कार्यकर्ता के तौर पर वे पहली बार जेल गए। बाद में 1938 में, वे किसान सभा में शामिल हुए और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष भी बने। किसान आंदोलनों में शामिल रहने के दौरान वे कई बार जेल गए। वे 1939 में शुरू हुई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की मुंगेर इकाई के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

 

सवाल यह उठता है कि क्या रानीगंज में मूर्ति हटाने वाले गुंडों को इन सब बातों की जानकारी थी, या फिर यह वामपंथी और प्रगतिशील समूहों की सभाओं के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली जगह पर की गई तोड़-फोड़ की एक बेमतलब की हरकत थी? इसमें कोई शक नहीं कि आरएसएस के विचारकों ने वामपंथ और वामपंथी विचारधारा को अपना मुख्य दुश्मन मान लिया है। अगर सत्ता में बैठे लोग और उनके कार्यकर्ता इसे गंभीरता से लेते हैं, तो अब पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी हस्तियों को लगातार निशाना बनाया जाएगा।

 

लेकिन आज हमारे लिए, राहुल सांकृत्यायन का नाम खास मायने रखता है। उन्होंने जो जुझारू भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाया, उसका खासा महत्व है। करपात्रीजी जैसे ‘सनातनियों’ ने ऐतिहासिक भौतिकवाद जो हमला किया था, उसका उन्होंने अपनी छोटी-सी पुस्तिका ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ में खंडन किया था। उनका यह काम आज खास तौर पर महत्वपूर्ण है। धार्मिक आस्था का इस्तेमाल करके हर तरह के शोषण को ‘माया’ और अमीरों और ताकतवर लोगों के आगे बिना सोचे-समझे झुकने को इंसान की किस्मत, ब्राह्मणवादी शासन को नैतिक और पति की चिता पर मरना औरतों का फ़र्ज़ बताने पर उनकी शानदार व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को आज के नज़रिए से पढ़ना होगा, जहाँ शोषित और दबे-कुचले लोगों के दिमाग को गुलाम बनाने के लिए फासीवादी नासमझी फैलाई जा रही है। हाँ, फासीवादियों को उस अदम्य इंसानी दिमाग से डरने की ज़रूरत है, जिसका महापंडित राहुल सांकृत्यायन प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

*(लेखिका संस्कृतिकर्मी, नाटककार, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, महिला आंदोलन की नेत्री और पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

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