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1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो’ के नारे के साथ 31 मई को होगा ऐतिहासिक चंबल शौर्य दिवस आयोजन, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

‘1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो’ के नारे के साथ 31 मई को होगा ऐतिहासिक चंबल शौर्य दिवस आयोजन

 

चकरनगर, इटावा। चंबल-यमुना दोआब क्षेत्र में आगामी 31 मई 2026, रविवार को प्रातः 10 बजे राजगढ़ी, चकरनगर में “चंबल शौर्य दिवस” का ऐतिहासिक आयोजन किया जाएगा। ‘1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो’ के नारे के साथ आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर चंबल परिवार अंतिम रूप देने में जुटा हुआ है। आयोजन के दौरान चंबल मिशन की आगामी कार्यनीति भी तय की जाएगी।

 

बताया गया कि 31 मई 1857 को चकरनगर रियासत के राजा कुशलपाल सिंह चौहान और कुंवर निरंजन सिंह चौहान ने दोआब क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसके बाद पूरा चंबल अंचल जनक्रांति में बदल गया और कंपनी राज को बीहड़ों के हर मोर्चे पर कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।

 

चंबल फाउंडेशन परिवार द्वारा संचालित “चंबल मिशन” अभियान के तहत 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपेक्षित क्रांतिकारियों जीता चमार, जंगली-मंगली मेहतर और मारून सिंह लोधी को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाने की मांग तेज हो गई है। अभियान के अंतर्गत गांव-गांव जनचौपाल आयोजित कर लोगों को इन गुमनाम वीरों के संघर्ष, बलिदान और क्रांतिकारी योगदान से परिचित कराया जा रहा है।

 

अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन क्रांतिनायकों को स्वतंत्रता के दशकों बाद भी उचित पहचान नहीं मिल सकी है। जनचौपालों में उनके संघर्ष की गाथाएं सुनाई जा रही हैं और लोकगीतों के माध्यम से नई पीढ़ी को उनके शौर्य से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

 

अभियान के दौरान “चंबल शौर्य स्मारक” निर्माण की मांग भी प्रमुखता से उठाई जा रही है। प्रस्तावित स्मारक में क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं, पुस्तकालय, ऑडिटोरियम, लाइट एंड साउंड शो, ‘चंबल गाथा’ डॉक्यूमेंट्री, डाक टिकट जारी करने तथा विश्वविद्यालय की स्थापना जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। साथ ही इन वीरों के जीवन और योगदान को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग भी की जा रही है।

 

चंबल मिशन से जुड़े लोगों का कहना है कि नई पीढ़ी को अपने क्षेत्र के इतिहास और बलिदानी परंपरा से जोड़ना समय की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से जनचौपालों के साथ हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसमें कागज और कपड़े दोनों पर लोगों से समर्थन लिया जा रहा है। ग्रामीणों और युवाओं में अभियान को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। अभियान के समापन के बाद व्यापक जनसमर्थन से तैयार ज्ञापन सरकार को सौंपा जाएगा।

 

चौरेला, हुकुमपुरा, बेनीपुरा, बंसरी, रौरा का पुरा, लुहिया खुर्द, रेलवे कॉलोनी, बहादुरपुर लोहिया, भीखेपुर, बाबरपुर, शेरपुर कोठी, जगम्मनपुर, गढ़िया मुलू सिंह, राजपुर, अयारा, झम्मनपुर, बनकटी खुर्द, शिवराजपुर, हरनाथपुर, कल्याणपुर, रजपुरा, नगला ताड़, लोहिया कला, भारौली का पुरा, जामना, बल्लो गढ़िया, सिंडौस, मरदान पुरा, खुशहाली का पुरा, हिम्मतपुर, जुहीखा, तातारपुर, पान सिंह का पुरा, कंजौसा, भरथना, भैसाई, जारपुरा, पूठन सकरौली, लोकटी, लोहन्ना, कर्वाखेड़ा, बिरहाई, मुकुटपुरा, निवाड़ी कला, महेवा, बिठौली, शेरगढ़, नीमरी, करियावली, कालेश्वर गढ़िया, बिहार और पिपरौली गढ़िया सहित कई गांवों में जनसंपर्क और जनचौपाल कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं।

 

अभियान के अनुसार चंबल की धरती सदियों से अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और आत्मसम्मान की प्रतीक रही है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में चकरनगर और भरेह रियासत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर पंचनद घाटी को स्वतंत्र घोषित किया था। इस दौरान चंबल के रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना को कई मोर्चों पर चुनौती दी।

 

जंगली-मंगली मेहतर को अभियान में दलित शौर्य के अमर प्रतीक के रूप में याद किया जा रहा है। बताया गया कि उन्होंने चकरनगर को केंद्र बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ कई युद्ध लड़े और वर्ष 1858 में वीरगति प्राप्त की। वहीं बंसरी गांव के जीता चमार को पंचनद क्षेत्र का अडिग योद्धा बताया गया, जिन्होंने अंग्रेजों के आत्मसमर्पण के प्रस्ताव को ठुकराते हुए अंतिम समय तक संघर्ष जारी रखा।

 

मारून सिंह लोधी को चंबल का निर्भीक क्रांतिनायक बताते हुए कहा गया कि ब्रिटिश दस्तावेजों में भी उनकी वीरता का उल्लेख मिलता है। अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने उन्हें “नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविन्स का सबसे खतरनाक व्यक्ति” तक कहा था। गिरफ्तारी और फांसी की सजा के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष जारी रखा।

 

अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि स्वतंत्र भारत में इन क्रांतिवीरों के इतिहास का ईमानदार पुनर्मूल्यांकन नहीं हुआ और उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे। उनका कहना है कि चंबल की पहचान केवल बीहड़ या अपराध नहीं, बल्कि बलिदान, विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली परंपरा रही है।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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