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तानाशाही के प्रोजेक्ट पर जेन-ज़ी ने लगाया ब्रेक!* *(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

 

 

*तानाशाही के प्रोजेक्ट पर जेन-ज़ी ने लगाया ब्रेक!*

*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*

 

आखिरकार, शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान की विदाई हो गयी। कॉकरोच जनता पार्टी के सहारे सामने आयी युवा आक्रोश की आंधी ने मोदीशाही को अपने इस स्वघोषित सिद्घांत को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि उसकी सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं। देश के युवाओं ने, बल्कि कहना चाहिए कि जेन-ज़ी ने, मोदीशाही को अपनी उक्त मुद्रा को बदलने पर मजबूर कर दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह की मुद्रा, जनतंत्र में शासन और उसमें भी सबसे बढ़कर कार्यपालिका की जवाबदेही का रास्ता कसकर बंद करने की, तानाशाहीपूर्ण जिद को ही दिखाती है। कार्यपालिका की जवाबदेही, उसी प्रकार जनतंत्र की न्यूनतम शर्त है, जैसे कार्यपालिका का आम जनता द्वारा चुना जाना। इस सिलसिले में यह याद दिलाना अप्रासांगिक नहीं होगा कि ऐसा नहीं है कि इन 12 साल से ज्यादा में मोदी ने अपने किसी मंत्री को बदला या हटाया ही नहीं हो। बेशक, अपने तीन कार्यकालों के बीच मोदी ने दर्जनों मंत्रियों के विभागों को बदला या उन्हें हटाया है।

 

लेकिन, अब तक ये सारे बदलाव मोदी ने अपनी मर्जी से, संबंधित व्यक्तियों की उपयोगिता की अपनी समझ के आधार पर किए थे। इसका एकलौता अपवाद जेएम अकबर बने, जिन्हें ‘मी-टू’ की लहर में लगे आरोपों के सहारे मंत्रिमंडल से बाहर करना, शायद संघ को मंत्रिमंडल को मुस्लिम-मुक्त कराने के लिए जरूरी लगा होगा।

 

जनतांत्रिक दबाव के सामने झुकना, मोदीशाही के तानाशाहीपूर्ण मिजाज को मंजूर होना दूर रहा, इससे उल्टा संदेश देना ही उसकी मजबूत आत्मछवि के लिए जरूरी माना जाता रहा है। याद रहे कि धर्मेंद्र प्रधान के विभाग में भी, मोदी के राज के शुरूआती दौर में मंत्री बनाकर बैठायी गयी, अभिनेत्री से राजनीतिक नेता बनी स्मृति ईरानी शुरू से ही विवादों में घिरी रही थीं और रोहित वेमुला कांड से लेकर, जेएनयू के खिलाफ संघ-भाजपा की खुल्लमखुल्ला शत्रुतापूर्ण मुहिम तक कई विवाद ही शामिल नहीं थे, बल्कि खुद प्रधानमंत्री मोदी की तरह, उनकी शैक्षणिक योग्यता भी निरंतर विवादों से घिरी रही थी। इसके बावजूद उन्हें हटाने की शैक्षणिक समुदाय की मांगों को नरेंद्र मोदी ने लगातार अनदेखा किया और बाद में शिक्षा मंत्रालय से तब उनका तबादला किया, जब इस मंत्रालय पर आरएसएस के प्रत्यक्ष नियंत्रण के लिए वह ज्यादा उपयोगी नहीं नजर आयीं। इस अर्थ में देश के युवाओं ने जनतांत्रिक दबाव के प्रभावीपन को फिर से स्थापित करने के जरिए, मोदीशाही की तानाशाही की परियोजना को कम-से-कम दो कदम पीछे तो धकेल ही दिया है।

 

जनतंत्र के पक्ष में युवाओं के इस हस्तक्षेप का महत्व इस तथ्य से बहुत बढ़ जाता है कि यह हस्तक्षेप, विधानसभा चुनावों के हालिया चक्र के फौरन बाद आया है, जिस चक्र के बाद अव्वल तो प. बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के जरिए, देश में सत्ता पर संघ-भाजपा का शिकंजा और भी कस गया था। और इससे भी महत्वपूर्ण रूप से, चुनाव के इस चक्र ने देश में चुनाव प्रक्रिया की वैधता के मोदी राज द्वारा रसातल में पहुंचा दिए जाने के प्रबल संकेत दिये थे। मोदी राज में चुनाव आयोग जिस तरह से चुनाव में सभी प्रतिद्वंद्वियों के लिए बराबरी का मैदान मुहैया कराने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह से मुंह मोड़कर, सत्तापक्ष की ओर मुंह कर के बैठ गया है, उसके ऊपर से चुनाव के इस चक्र में सत्तापक्ष को खासतौर पर बंगाल में जिताने के लिए चुनाव आयोग ने एसआईआर के नाम पर मतदाता सूचियों में से करीब 27 लाख जैनुइन मतदाताओं के मताधिकार को टार्गेटेड तरीके से विवादित बनाकर, उनका मताधिकार निलंबित करा दिया था। इसके अलावा सारे चुनावी तंत्र ही नहीं, पुलिस-प्रशासनिक तंत्र को भी, सचेत रूप से केंद्रीय प्रशासन के नियंत्रण में दे दिया गया था।

 

और यह सब जिस नंगई से किया गया था और इस सब को जिस तरह शीर्ष न्यायपालिका ने होते रहने दिया था, उससे जनतंत्र की चिंता करने वालों ने वास्तव में यह सवाल करना शुरू कर दिया था कि क्या ऐसे हालात में, चुनाव का कोई अर्थ बचा भी है? यह सवाल सिर्फ स्वतंत्र बौद्घिकों/ राजनीतिक समीक्षकों तक ही सीमित नहीं था। देश में लगभग समूचा विपक्ष ही किसी न किसी हद तक इस सवाल से दो-चार हो रहा था। इसी का नतीजा था कि विधानसभा चुनाव के पिछले चक्र के बाद, विपक्षी इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों के अलावा दो अन्य पार्टियों को मिलाकर, कुल 23 राजनीतिक पार्टियों ने, देश के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र लिखकर, वर्तमान चुनाव आयोग के कदमों से चुनावों की निष्पक्षता तथा वैधता के खतरे में पड़ जाने के संदर्भ में, न्यायपालिका के हस्तक्षेप की जरूरत को रेखांकित किया था। इसके ऊपर से, इन पार्टियों ने संयुक्त रूप से यह सवाल भी उठाया था कि न्यायपालिका के अलावा और कोई दरवाजा भी तो नहीं बचा है, जिसे वे न्याय के लिए खटखटा सकें!

 

आज जब न्यायपालिका समेत जनतंत्र की सभी संस्थाओं पर, संसदीय बहुमत के बल पर कार्यपालिका पर काबिज हुए संघ-भाजपा का करीब मुकम्मल कब्जा हो गया है, देश में जनतंत्र के ढांचे के नाम पर जो कुछ बचा है, उसके तहत विपक्ष की इस निराशा में एक और महत्वपूर्ण तत्व, परिसीमन की सिर पर लटकती तलवार का है, जो सत्तापक्ष को देश के राजनीतिक भूगोल को ही अपने मनमाफिक बदलने का मौका दे सकता है। हाल के वर्षों में, वर्तमान चुनाव आयोग के ही नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर और असम में परिसीमन किए जाने का अनुभव भी देश के सामने आ चुका है। इन दोनों ही राज्यों में परिसीमन इस तरह से किया गया कि उसने सत्तापक्ष के बहुसंख्यकवादी राजनीतिक आधार की चुनावी ताकत तथा प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने का और खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की चुनावी ताकत तथा प्रतिनिधियों की संख्या घटाने का काम किया है। देश के पैमाने पर आबादी को ही आधार बनाकर परिसीमन किया जाता है तो, उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक वजन में, उत्तर के पक्ष में भारी उलट-फेर कर सकता है। इसके ऊपर से परिसीमन की प्रक्रिया पर सत्तापक्ष का नियंत्रण, उसे राज्यों की सीमाओं के अंदर चुनाव क्षेत्रों में मन मुताबिक फेर-बदल करने का मौका देगा, वह अलग। इसके बाद तो सत्तापक्ष एक प्रकार से सत्ता पर अपने कब्जे को, जनता की इच्छा से करीब-करीब स्वतंत्र ही कर सकता है।

 

याद रहे कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान, मोदीशाही ने महिला आरक्षण के लागू किए जाने का रास्ता साफ करने की आड़ में, परिसीमन के लिए संविधान संशोधन पारित कराने की कोशिश की थी। बेशक, उस समय विपक्ष ने एकजुट होकर उसकी इस कोशिश को विफल कर दिया, क्योंकि संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत सत्ता पक्ष की पहुंच से दूर था, लेकिन सत्ता पक्ष ने इस हार के बाद भी इसे थोपने की अपनी कोशिशें बंद नहीं की थीं। उल्टे विधानसभा चुनाव के हाल के चक्र के बाद से, खरीद-फरोख्त के नंगे खेल के जरिए, बंगाल में सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सदस्यों और उद्घव ठाकरे की शिव सेना के भी लोकसभा सदस्यों का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा, अन्य पार्टियों में मिलाए जाने के रास्ते, सत्तापक्ष में पहुंचाया जा चुका है। इसके अलावा, शरद पवार की एनसीपी के सांसदों के इसी तरह पाला बदलने का और द्रमुक के सांसदों का भी समर्थन हासिल करने की सत्तापक्ष द्वारा सैटिंग की खबरें आती रही हैं, जिससे दो-तिहाई बहुमत समर्थन का आंकड़ा भी संभव नजर आने लगा था। वास्तव में बड़े पैमाने पर इसकी अटकलें लगायी जा रही थीं कि संसद के चालू मानसून सत्र में ही मोदीशाही, सिर्फ परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक ही नहीं, बल्कि मंत्रियों आदि के पांच साल से ज्यादा की सजा वाले आरोप में 30 दिन से ज्यादा हिरासत में रखे जाने पर, मंत्रिपद खुद-ब-खुद छिन जाने से संबंधित संविधान संशोधन भी पारित कराने की कोशिश कर सकती है।

 

बहरहाल, युवाओं के आंदोलन ने, हालांकि यह आंदोलन मुख्यत: शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित रहा है, मोदीशाही के इन मंसूबों पर ठंडा पानी डाल दिया लगता है। इस आंदोलन ने बुनियादी जनतांत्रिक तकाजों के आधार पर, मोदीशाही के तानाशाही के प्रोजेक्ट पर जैसी तगड़ी चोट की है, उसका असर इस प्रोजेक्ट के शिक्षा से संबंधित हिस्से तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इस समूचे प्रोजेक्ट पर ही पड़ेगा। याद रहे कि राजनीतिक पार्टियों से दूरी की अपनी भाषा के बावजूद, युवा पीढ़ी ने मौजूदा निजाम के बढ़ते हुए तानाशाहाना निजाम की तीखी, स्पष्ट और लगभग चौतरफा आलोचना प्रस्तुत की है और वह भी आंदोलन के मैदान में। इसके बाद, मौजूदा निजाम के लिए अपने तानाशाही के मंसूबों को आगे बढ़ाना और मुश्किल हो जाएगा। अब राजनीतिक विपक्ष के साथ ही, उसके इन मंसूबों को युवा पीढ़ी की भी वैचारिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा होगा, जिसका मुकाबला करने में संघ-भाजपा तथा उनके शासन की प्रकट असमर्थता ने ही मोदीशाही को, किसानों के एक साल से लंबे आंदोलन के बाद, दूसरी बार किसी जन-आंदोलन के सामने झुकने के लिए मजबूर किया है।

 

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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