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आम नागरिक की सील पड़ी छत और बिल्डरों की खुली छूट,

*विकास की अंधी गंगा और एलडीए के श्रेष्ठ आचार की गाथा,*

 

*आम नागरिक की सील पड़ी छत और बिल्डरों की खुली छूट,*

 

*संवाददाता सैफ साबरी*

लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी एलडीए के प्रवर्तन जोन-1 में आजकल विकास की गंगा नहीं, बल्कि नियमों और दावों को बहा ले जाने वाली विनाश की धारा प्रवाहित हो रही है। जगपाल खेड़ा रोड, दुर्गा पुरी कॉलोनी और विज्ञान खंड गोमती नगर जैसे इलाकों में अवैध निर्माणों के जो जीवंत किस्से सामने आ रहे हैं, वे विभाग की कार्यशैली पर गहरा तंज कसने के लिए पूरी तरह काफी हैं।

 

कहा जाता है कि शासन और प्रशासन में अखबारों की खबरें और जनता की शिकायतें एक सुझाव की तरह होती हैं, जिन्हें सुधार का पैमाना माना जाना चाहिए। लेकिन एलडीए के गलियारों में इन सुझावों को सीधे इशू मान लिया जाता है। कारण साफ है, विभाग अपनी उस चेहरे की सूरत आईने में नहीं देखना चाहता, और जब कोई सच्चाई का आईना सामने ले आता है, तो उसके खिलाफ तरह-तरह की रणनीतियाँ तैयार होने लगती हैं।

 

जोन-1 में चल रहे अवैध निर्माणों की दास्तान यह साबित करने के लिए काफी है कि यहां कानून के पैमाने हर व्यक्ति के हिसाब से अलग-अलग तय होते हैं। एक आम नागरिक जब अपने सिर पर छत पाने के लिए मकान बनाता है, तो उसे नियमों की बारीकियाँ शायद उतनी नहीं पता होतीं। थोड़ा बहुत अतिरिक्त निर्माण क्या हुआ, प्राधिकरण के चाबुक ने ऐसा तांडव मचाया कि वह निर्माण पिछले कई सालों से पूरी ईमानदारी के साथ सील पड़ा है।

 

वही थोड़ी ही दूरी पर एक बड़े बिल्डर का निर्माण चल रहा है। बिल्डर कानून के हर पेंच से वाकिफ होता है और उसका सिस्टम अवर अभियंता से लेकर सहायक अभियंता और जोनल अफसर तक पूरी तरह फिट बैठता है। स्थानीय लोगों के दबाव और शिकायतों के बाद कागजों पर खानापूर्ति के लिए इसे सील तो कर दिया गया, लेकिन साथ ही अंदरखाने यह संदेश भी दे दिया गया कि धीमे-धीमे काम पूरा करते रहो।

 

हद तो तब हो जाती है जब इसी से चंद कदमों की दूरी पर एक और विशाल निर्माण धड़ल्ले से खड़ा मिलता है। नियमों को ताक पर रखकर बना यह अवैध ढांचा अब एक चलता-फिरता व्यावसायिक मॉल बनकर पूरी तरह तैयार हो चुका है। हैरानी की बात यह है कि इस पर न तो कभी कोई सीलिंग की कार्रवाई हुई, न ही विभाग का कोई पीला पंजा ध्वस्तीकरण, इस पर चला।

 

इसके अलावा अमेठी यूनिवर्सिटी के ठीक सामने एक और बड़ा निर्माण नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है। क्या यहां प्राधिकरण की आंखें भ्रष्टाचार की पट्टी बांध लेती हैं या फिर नोटों की चमक इतनी तेज होती है कि ये बड़े-बड़े निर्माण नजर ही नहीं आते?

 

वीसी साहब मंचों से भले ही यह फरमान जारी करते हों कि शहर में केवल 6 प्रतिशत निर्माण ही वैध हैं और बाकी सब अवैध, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। गोमती नगर जैसे इलाके अवैध निर्माणों की चपेट में हैं, पर प्रवर्तन जोन-1 में कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिसों के कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं।

 

कहा जाता है कि पुराने दौर में अधिकारियों का ऐसा खौफ था कि इंजीनियर दफ्तर के इर्द-गिर्द आने से भी कतराते थे, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में शिकायतों और अखबारों की सुर्खियों का संज्ञान लेना तो दूर, फाइलों को कागजों की फाइलों में दबाकर सब कुछ सामान्य दिखाने का हुनर बखूबी निभाया जा रहा है। मलाईदार क्षेत्रों की जिम्मेदारी ऐसे हाथों में सौंप दी गई है जिन पर पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं और जो अदालत से राहत पाकर मैदान में उतरे हैं।

 

अब सवाल यह उठता है कि क्या एलडीए के मुखिया इसी ढर्रे पर गाड़ी चलाते रहेंगे, या फिर कभी इस व्यवस्था में कोई वास्तविक परिवर्तन देखने को मिलेगा? फिलहाल तो जोन-1 में इंजीनियरों की मौज जारी है और जनता कागजी कार्रवाई के समंदर में गोता लगाने को मजबूर है।

 

 

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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