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रीवा पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल: RTI में फर्जी जानकारी देने का आरोप, भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की

रीवा पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल: RTI में फर्जी जानकारी देने का आरोप, भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की।

अमहिया थाना प्रभारी पर फर्जी पंचनामा बनाने और गलत आयु दर्ज करने का आरोप; DGP और SP को भेजा गया पत्र।

 

 

 

मध्य प्रदेश रीवा।

मध्य प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर गहरे संकट में है। रीवा जिले के अमहिया थाना क्षेत्र के एक मामले में पुलिस द्वारा आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तहत कथित रूप से भ्रामक और गलत जानकारी देने का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना को लेकर भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

शिकायतकर्ता के अनुसार, जब वे टीआरएस (TRS) महाविद्यालय में बीकॉम की पढ़ाई कर रहे थे, उस समय उनकी आयु 23 वर्ष थी। आरोप है कि अमहिया थाना पुलिस ने एक फर्जी पंचनामा तैयार किया, जिसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया गया। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि वर्ष 2026 में प्राप्त सरकारी दस्तावेजों में भी उनकी आयु को वास्तविकता के विपरीत मात्र 23 वर्ष दर्शाया गया है, जबकि उनकी वर्तमान आयु 32 वर्ष है।

पीड़ित ने इसे प्रशासनिक लापरवाही और सोची-समझी साजिश करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमहिया थाना प्रभारी ने तथ्यों की जांच किए बिना ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, जो कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण हैं।

भारतीय मीडिया फाउंडेशन का हस्तक्षेप।

मामले को गंभीरता से लेते हुए भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी एवं यूनियन के संस्थापक एके बिंदुसार ने संयुक्त रूप से मध्य प्रदेश शासन, पुलिस महानिदेशक (DGP) और रीवा पुलिस अधीक्षक से मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। पदाधिकारियों ने कहा कि पुलिस जैसे जिम्मेदार विभाग द्वारा इस तरह की लापरवाही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। यदि दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो जनता का कानून व्यवस्था से विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

कानूनी प्रावधान और RTI अधिनियम का उल्लंघन।

जानकारों के अनुसार, आरटीआई अधिनियम 2006 के तहत किसी भी लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानबूझकर गलत या भ्रामक जानकारी देना दंडनीय अपराध है। नियमों के अनुसार, ऐसे अधिकारियों को 3 वर्ष तक का कारावास हो सकता है।

पीड़ित ने स्पष्ट किया है कि:

1. अमहिया थाना प्रभारी द्वारा आरटीआई में दी गई जानकारी पूर्णतः तथ्यहीन और फर्जी है।

2. सरकारी दस्तावेजों में आयु का गलत अंकन प्रशासनिक अक्षमता के साथ-साथ पद का दुरुपयोग है।

3. इस पूरे घटनाक्रम के लिए थाना प्रभारी, रीवा पुलिस कप्तान और संबंधित उच्च अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

मीडिया से न्याय की गुहार,

पीड़ित ने मीडिया जगत से आग्रह किया है कि वे इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित करें ताकि प्रशासनिक भ्रष्टाचार का यह चेहरा जनता के सामने आ सके। उन्होंने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि, “ऐसे पुलिस अधिकारियों पर धिक्कार है जो पद की गरिमा को भूलकर फर्जीवाड़ा करने पर उतारू हैं।”

 

निष्पक्ष जांच: अमहिया थाना प्रभारी द्वारा तैयार किए गए संदिग्ध पंचनामों की उच्च स्तरीय जांच हो।

कठोर कार्रवाई: आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन करने वाले दोषी अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल निलंबन और कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस अधीक्षक और डीजीपी महोदय से आग्रह है कि वे अधीनस्थ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाएं ताकि भविष्य में किसी नागरिक को ऐसे उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।

भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यूनियन इस मामले को लेकर सड़क से लेकर उच्च न्यायालय तक संघर्ष करने के लिए बाध्य होगी।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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