अपनी बात
आओ जाने अंजाने सच स्वीकारेँ
शंकर देव तिवारी
बाह विधान सभा से सबसे ज्यादा विधायक जिस परिवार से रहा है तो वह है भदावर परिवार। अब तक का इतिहास है भदावर परिवार के अलावा कोई भी दोवारा विधायक नहीं बन पाया है। एक बार छोड़ दें तो कभी कोई भी इस परिवार का सदस्य हारा भी नहीं है। महिला प्रतिनिधि के रूप मे भी जो बाह से दो महिलाएं जीती हैं उनमें भी दोनों ही बहुएं भदोरिया ही रही हैं। जिनमें से एक स्वंत्रता सेनानी विद्यावती राठौर तो दूसरी दो बार रानी पक्षालिका सिंह हैं।
बाह से भदावर राजा रिपुदमन सिंह जी और अरिदमन सिंह जी , विद्यावती राठौर से पहले शम्भू नाथ चतुर्वेदी, रामदास, राम चरण, अमर चन्द्र शर्मा, मधुसूदन् शर्मा विधायक बने हैं। बाह के जो छः विधायक गेर भदावर स्टेट वालों में से दो ही ऐसे कांग्रेस के सदस्य रहे फिर से भी कई बार जन प्रतिनिधि चुने गए मगर चार कहीं से नहीं जीत सके। शम्भू नाथ जी तो दो बार एम पी और मेयर भीअग्ररा से बने। जबकि राठौर जी तो फरुखबाद से के बार जीतीं और वे तो बाह से मंत्री भी बनी।
ये सब बतलाने के पीछे आज की पीढी की नीति और नियति को जानना और उनको हकीकत से अवगत कराना है।
भदावर स्टेट के उम्मीदवार को समर्थन दल गत न मिलकर अस्थागत मिलता है। वो कभी काग्रेस से नहीं लडे। उनका चुनाव कभी दल के बल नहीं हुआ मगर अब पिछले दो चुनाव दल के तहत आए मगर मतदाता दल गत नहीं मिले। मेरे कहने का मतलब साफ है वे जिस किसी भी स्थिति से लड़ते हैं जीतते हैं। क्योंकि यहां से उनसे लड़ने वाले दल गत खड़े होते हैं। और उनके समर्थक दल के हूँ हैं आस्था के नहीं। हम आज ये कह सकते हैं कि दल गत लोग अपने अपने विपक्षी दलों से जूझते रहते। वे अपने अस्थावांन प्रजा के बल ही मजबूत रहते हैं।
हमने देखा है जो नई पीढी के लोग नेता बने वे दलगत ही क्षेत्र में सक्रिय रहते। मजे की बात तो तब होती है ग्राम सभा का चुनाव लड़ने वाला भी सीधे प्रधान मंत्री की बहस में उलझा दिखता है। जैसे मनोज नरेन्द्र को ही ले लें वे स्थानीय विरोध के प्रति कभी सजग नहीं रहे। उन्होंने प्रण मंत्री मुख्यमन्त्री की नीतियों को पकड़ा उनका बखिया उधेरा बस हो गई जिम्मेदारी पूर्ण।
जबकि उन्हे यहाँ से जीतने वाले के आस पास के माहौल से सजग रहने की जरूरत होनी चाहिए। उनके चकर्व्यूह को समझना होगा तभी वे सफल हो सकते है नहीं विचारते और वहीं अंधा चुनाव होता रहता है। वो कोई भी दल बदलकर आ जाएं वो अपने बल पर जीतते हैं किसी दल के ऊपर नहीं। एक बात और है वे काँग्रेस से कभी नहीं जुड़े क्योंकि उनके सगे सम्बन्धी काँग्रेस के रहे। एक सपा को छोड़ शेष सभी दलों ने उनका सम्मान किया मगर सपा से जिस तरह से वो दूर किए गए को लेकर वे याद भी नहीं रखना चाहेंगे। वर्तमान उनका दल
आर एस एस को छोड़ दें तो उन्हें सभी बिंदुओं पर हरी झण्डी मिली हुई है वहीं रानी साहिबा का अपना एक परिचय भी बन चुका है। आगे के लिए बाह की चुनावी बिसात पर वे अजय के रूप में ही नजर आयेंगी। हां युवा पीढी अगर बढे बूढों की सीख ग्रहण करेगी तो चुनाव बेहद रोचक रह सकता है। जिला और स्टेडियम दो सवाल ही निर्णायक हो सकते हैं। सुरक्षा स्वस्थ्य और शिक्षा जैसे अहम सवाल पेयजल और रोजगार सड़क पुल भी सवाल हैं जिन पर हमें गम्भीर होना होगा।
एक सवाल एक जवाबअपनी बात
आओ जाने अंजाने सच स्वीकारेँ
शंकर देव तिवारी
बाह विधान सभा से सबसे ज्यादा विधायक जिस परिवार से रहा है तो वह है भदावर परिवार। अब तक का इतिहास है भदावर परिवार के अलावा कोई भी दोवारा विधायक नहीं बन पाया है। एक बार छोड़ दें तो कभी कोई भी इस परिवार का सदस्य हारा भी नहीं है। महिला प्रतिनिधि के रूप मे भी जो बाह से दो महिलाएं जीती हैं उनमें भी दोनों ही बहुएं भदोरिया ही रही हैं। जिनमें से एक स्वंत्रता सेनानी विद्यावती राठौर तो दूसरी दो बार रानी पक्षालिका सिंह हैं।
बाह से भदावर राजा रिपुदमन सिंह जी और अरिदमन सिंह जी , विद्यावती राठौर से पहले शम्भू नाथ चतुर्वेदी, रामदास, राम चरण, अमर चन्द्र शर्मा, मधुसूदन् शर्मा विधायक बने हैं। बाह के जो छः विधायक गेर भदावर स्टेट वालों में से दो ही ऐसे कांग्रेस के सदस्य रहे फिर से भी कई बार जन प्रतिनिधि चुने गए मगर चार कहीं से नहीं जीत सके। शम्भू नाथ जी तो दो बार एम पी और मेयर भीअग्ररा से बने। जबकि राठौर जी तो फरुखबाद से के बार जीतीं और वे तो बाह से मंत्री भी बनी।
ये सब बतलाने के पीछे आज की पीढी की नीति और नियति को जानना और उनको हकीकत से अवगत कराना है।
भदावर स्टेट के उम्मीदवार को समर्थन दल गत न मिलकर अस्थागत मिलता है। वो कभी काग्रेस से नहीं लडे। उनका चुनाव कभी दल के बल नहीं हुआ मगर अब पिछले दो चुनाव दल के तहत आए मगर मतदाता दल गत नहीं मिले। मेरे कहने का मतलब साफ है वे जिस किसी भी स्थिति से लड़ते हैं जीतते हैं। क्योंकि यहां से उनसे लड़ने वाले दल गत खड़े होते हैं। और उनके समर्थक दल के हूँ हैं आस्था के नहीं। हम आज ये कह सकते हैं कि दल गत लोग अपने अपने विपक्षी दलों से जूझते रहते। वे अपने अस्थावांन प्रजा के बल ही मजबूत रहते हैं।
हमने देखा है जो नई पीढी के लोग नेता बने वे दलगत ही क्षेत्र में सक्रिय रहते। मजे की बात तो तब होती है ग्राम सभा का चुनाव लड़ने वाला भी सीधे प्रधान मंत्री की बहस में उलझा दिखता है। जैसे मनोज नरेन्द्र को ही ले लें वे स्थानीय विरोध के प्रति कभी सजग नहीं रहे। उन्होंने प्रण मंत्री मुख्यमन्त्री की नीतियों को पकड़ा उनका बखिया उधेरा बस हो गई जिम्मेदारी पूर्ण।
जबकि उन्हे यहाँ से जीतने वाले के आस पास के माहौल से सजग रहने की जरूरत होनी चाहिए। उनके चकर्व्यूह को समझना होगा तभी वे सफल हो सकते है नहीं विचारते और वहीं अंधा चुनाव होता रहता है। वो कोई भी दल बदलकर आ जाएं वो अपने बल पर जीतते हैं किसी दल के ऊपर नहीं। एक बात और है वे काँग्रेस से कभी नहीं जुड़े क्योंकि उनके सगे सम्बन्धी काँग्रेस के रहे। एक सपा को छोड़ शेष सभी दलों ने उनका सम्मान किया मगर सपा से जिस तरह से वो दूर किए गए को लेकर वे याद भी नहीं रखना चाहेंगे। वर्तमान उनका दल
आर एस एस को छोड़ दें तो उन्हें सभी बिंदुओं पर हरी झण्डी मिली हुई है वहीं रानी साहिबा का अपना एक परिचय भी बन चुका है। आगे के लिए बाह की चुनावी बिसात पर वे अजय के रूप में ही नजर आयेंगी। हां युवा पीढी अगर बढे बूढों की सीख ग्रहण करेगी तो चुनाव बेहद रोचक रह सकता है। जिला और स्टेडियम दो सवाल ही निर्णायक हो सकते हैं। सुरक्षा स्वस्थ्य और शिक्षा जैसे अहम सवाल पेयजल और रोजगार सड़क पुल भी सवाल हैं जिन पर हमें गम्भीर होना होगा।
एक सवाल एक जवाब








