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मूल्यों का पराभव और सामाजिक सरोकार की चुनौतियाँ शंकर देव तिवारी 

 

मूल्यों का पराभव और सामाजिक सरोकार की चुनौतियाँ

 

शंकर देव तिवारी

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किसी भी समाज की असली पहचान उसके अतीत के उन नायकों से होती है जिन्होंने दशकों तक प्रभाव में रहने के बाद भी शालीनता और संस्कारों का दामन नहीं छोड़ा। यदि हम पिछले तीस-पैंतीस सालों के इतिहास को देखें, तो उस दौर के बड़े बुजुर्गों और मार्गदर्शकों ने समाज में कभी भी भय, आतंक या खोखले प्रदर्शन का माहौल नहीं बनने दिया। उनके पास यदि समाज में कोई विशिष्ट स्थान या प्रभाव था, तो उसे उन्होंने कभी सड़क पर अभद्रता या दबंगई के रूप में प्रदर्शित नहीं किया। सार्वजनिक जीवन में चलते हुए भी वे हर कदम पर सामाजिक संस्कारों और मर्यादाओं को सर्वोपरि रखते थे। उनके आस-पास चाटुकारों की फौज नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील लोग होते थे जो उन्हें हमेशा जमीन से जोड़े रखते थे।

मगर आज के दौर और उस पारंपरिक नेतृत्व के बीच एक बहुत गहरी खाई साफ नजर आती है। आज का समय पूरी तरह से ‘कॉर्पोरेट काल’ और तीव्र व्यावसायिकता की चपेट में है। इस व्यावसायिक दौर का सबसे बड़ा और घातक असर यह हुआ है कि जीवन के हर क्षेत्र में—चाहे वह सामाजिक हो या नेतृत्व का—’शॉर्टकट’ संस्कृति हावी हो गई है। आज प्रभाव या पहचान कमाने के लिए दशकों की तपस्या, सेवा और संस्कारों की जरूरत नहीं समझी जाती। आज सोशल मीडिया पर 15 सेकंड की ‘ठसक वाली रील’ या संवादों के जरिए रातों-रात खुद को एक ‘मसीहा’ या ‘डॉन’ के रूप में पेश करने की होड़ मची है।

यह जो ‘शॉर्टकट’ से प्रभाव हासिल करने की कोशिश है, यह दरअसल एक बड़ा ‘दिशा पराभव’ (दिशा से भटक जाना) है। आज नेतृत्व के आस-पास रहने वाले लोगों का चरित्र भी बदल गया है। पहले जहाँ वे सामाजिक सरोकारों से जुड़े हितैषी होते थे, वहीं आज वे इस व्यावसायिक दौर के ऐसे हिस्से बन चुके हैं जो केवल तात्कालिक लाभ देखते हैं। जब सामाजिक और वैचारिक मूल्य इस कदर व्यावसायिक हो जाते हैं, तो संस्कार और मर्यादा पीछे छूट जाते हैं और उनकी जगह ले लेती है—एक कृत्रिम, खोखली और आक्रामक ठसक।

यह बदलाव अनायास नहीं है, बल्कि यह इस उपभोक्तावादी युग का एक अनकहा ढांचा है जो युवाओं को यह सिखा रहा है कि ताकत का मतलब दूसरों पर धौंस जमाना है, न कि उनका सम्मान करना। एक सजग समाज के रूप में हमें यह समझना होगा कि तीस-पैंतीस साल पहले जो शांति, गरिमा और सौहार्द का माहौल हमारे बुजुर्गों ने बनाकर रखा था, वह हमारी असली पूंजी है। आज की व्यावसायिक और शॉर्टकट वाली चमक-दमक के पीछे भागने के बजाय, हमें फिर से उन्हीं जड़ों और संस्कारों की ओर लौटना होगा, जहाँ प्रभाव का पैमाना ‘डराने की क्षमता’ नहीं, बल्कि ‘अपनाने की शालीनता’ हुआ करता था।

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