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शौचालय की फाइल पर नगर निगम में संग्राम, भाजपा पार्षद का नगर आयुक्त कक्ष में धरना, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

*शौचालय की फाइल पर नगर निगम में संग्राम, भाजपा पार्षद का नगर आयुक्त कक्ष में धरना*

 

*नगर आयुक्त के चेम्बर में धरने पर बैठे पार्षद सुनील करमचंदानी*

 

आगरा। आगरा नगर निगम में विकास कार्यों की फाइलों को लेकर भाजपा के नामित पार्षद सुनील करमचंदानी का आक्रोश उस समय खुलकर सामने आ गया, जब करीब छह महीने से लंबित शौचालय निर्माण के प्रस्ताव पर कार्रवाई न होने से नाराज होकर उन्होंने नगर आयुक्त के चैंबर में ही धरना दे दिया। पार्षद ने अधिकारियों पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि उनके प्रस्ताव को लंबे समय तक लंबित रखा गया, जबकि उसी क्षेत्र में विपक्षी पार्षद के प्रस्ताव पर तेजी से टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई। मामला सामने आने के बाद नगर आयुक्त ने संबंधित अधिकारियों से पूरी जानकारी तलब की। जांच में निर्माण विभाग की ओर से करीब 32 लाख रुपये के काम के लिए तीन अलग-अलग फाइलें तैयार किए जाने की बात सामने आई। नगर आयुक्त ने अधिकारियों को दो फाइलों में प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। वहीं, काफी देर तक समझाने के बाद पार्षद को धरने से उठाकर कुर्सी पर बैठाया गया। प्रस्तावित शौचालय निर्माण को आगे बढ़ाने के आश्वासन के बाद उनका गुस्सा शांत हुआ। सुनील करमचंदानी के मुताबिक शाहगंज क्षेत्र के रुई की मंडी में स्थानीय लोगों को सार्वजनिक शौचालय की आवश्यकता थी। जनता की मांग को देखते हुए उन्होंने 21 अप्रैल 2026 को नगर निगम में शौचालय निर्माण का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। इसके लिए संबंधित प्रोजेक्ट फाइल भी तैयार कराई गई थी। पार्षद का आरोप है कि प्रस्ताव देने के बाद वह लगातार नगर निगम के अधिकारियों और संबंधित विभागों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ी। कई महीने गुजरने के बावजूद निर्माण कार्य के लिए टेंडर की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। इसी देरी को लेकर उनका आक्रोश बढ़ता गया। विवाद तब और बढ़ गया, जब इसी क्षेत्र में शौचालय निर्माण के लिए बसपा पार्षद कप्तान सिंह चाहर की ओर से भी प्रस्ताव लगाया गया। सुनील करमचंदानी का आरोप है कि उनकी पुरानी फाइल लंबित रहने के बावजूद बाद में आई इस फाइल को अधिकारियों ने प्राथमिकता देते हुए टेंडर प्रक्रिया में पहुंचा दिया। पार्षद ने सवाल उठाया कि जब दोनों प्रस्ताव एक ही क्षेत्र की जनता की जरूरत से जुड़े थे तो उनके प्रस्ताव पर महीनों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दूसरे पार्षद के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से ऐसा संदेश गया कि विकास कार्यों में भी राजनीतिक आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। हालांकि, पक्षपात के आरोप पार्षद की ओर से लगाए गए हैं, जबकि नगर आयुक्त ने इस आरोप से अलग अपना पक्ष रखते हुए कहा कि विकास कार्यों की स्वीकृति पार्टी देखकर नहीं, बल्कि जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर की जाती है। मामले को लेकर सुनील करमचंदानी नगर आयुक्त के चैंबर में पहुंच गए और वहीं धरने पर बैठ गए। उन्होंने अधिकारियों के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की और कहा कि छह महीने से फाइल लेकर घूमने के बावजूद काम शुरू नहीं हुआ। मामला बढ़ता देख नगर आयुक्त ने संबंधित अधिकारियों से फाइलों की स्थिति की जानकारी ली। अधिकारियों से जानकारी मिलने के बाद करीब 32 लाख रुपये के काम से संबंधित तीन फाइलें सामने आईं। तीन फाइलें देखकर नगर आयुक्त ने अधिकारियों को दो फाइल तैयार करने/प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। काफी समझाने-बुझाने के बाद पार्षद को धरने से उठाकर कुर्सी पर बैठाया गया। इसके बाद उनके प्रस्ताव के आधार पर शौचालय निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया गया।

विवाद पर नगर आयुक्त ने स्पष्ट किया कि नगर निगम में विकास कार्यों की स्वीकृति राजनीतिक दल को देखकर नहीं दी जाती। उनका कहना था कि काम की आवश्यकता और प्राथमिकता के आधार पर विकास कार्यों को स्वीकृति दी जाती है। नगर आयुक्त ने अधिकारियों से पूरे मामले की जानकारी लेकर फाइलों की स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए। इसके बाद पार्षद को उनके प्रस्ताव पर शौचालय निर्माण की कार्रवाई आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया गया।

सुनील करमचंदानी ने कहा कि वह सत्ता पक्ष से जुड़े मनोनीत पार्षद हैं और क्षेत्र की जनता की मांग पर विकास कार्य का प्रस्ताव लेकर आए थे। उनका कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में सार्वजनिक शौचालय की जरूरत है तो राजनीतिक दल से अधिक महत्वपूर्ण जनता की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अपनी ही सरकार के समय जनप्रतिनिधियों को यदि विकास कार्यों के लिए महीनों तक अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ें तो इससे जनता के बीच गलत संदेश जाता है। पार्षद ने निगम अधिकारियों पर ‘बसपा मानसिकता’ से काम करने का आरोप भी लगाया। हालांकि यह उनका राजनीतिक आरोप है। नगर आयुक्त की ओर से इस आरोप को स्वीकार नहीं किया गया और विकास कार्यों को जरूरत के आधार पर स्वीकृत किए जाने की बात कही गई। एक सार्वजनिक शौचालय निर्माण की फाइल से शुरू हुआ विवाद अब नगर निगम की कार्यप्रणाली और विकास कार्यों की प्राथमिकता पर सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर पार्षद छह महीने की देरी का मुद्दा उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अधिकारियों के स्तर पर एक ही काम से जुड़ी तीन फाइलें सामने आने से प्रक्रिया की स्पष्टता को लेकर भी सवाल पैदा हुए हैं। अब नगर निगम के सामने चुनौती है कि शौचालय निर्माण के प्रस्ताव को जल्द आगे बढ़ाने के साथ यह भी स्पष्ट करे कि एक ही काम के लिए तीन फाइलें क्यों तैयार हुईं और किस स्तर पर फाइल लंबित रही। इससे भविष्य में ऐसे विवादों को रोकने में मदद मिल सकती है।

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