नेताओं के वादे और अफसरों की सुस्ती में उलझा उसेत घाट पुल, क्या फिर ‘अगली सरकार’ का इंतजार करेगी जनता?
विशेष रिपोर्ट: शंकर देव तिवारी
पिनाहट/आगरा:
पिनाहट: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर से शुरू हुआ चम्बल नदी का उसेत घाट पुल एक बार फिर उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की सुस्ती और नीतिगत उलझनों का शिकार होता नजर आ रहा है।मध्य प्रदेश राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने करीब 24 साल बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पुनर्जीवित कर ‘नेहले पर दहला’ मारने का प्रयास तो किया, लेकिन उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD), वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की ढुलमुल कार्यप्रणाली के कारण अब यह पुल पूरी तरह से अधर में लटकता दिख रहा है।
ताजा स्थिति के अनुसार, मध्य प्रदेश सेतु निगम अपने बजट और योजना के मुताबिक अंतिम पिलर से 300 मीटर तक का स्लोपिंग रैंप बनाकर अपना काम समेटने की तैयारी में है। इसके बाद का पूरा दारोमदार उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है, जिसे पिनाहट तक का मुख्य सम्पर्क मार्ग (अप्रोच रोड) बनाकर देना है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यूपी की सीमा में कदम रखते ही विकास की रफ्तार थम गई है।
अधिकारी मौन, जनप्रतिनिधि लापता
चौंकाने वाली बात यह है कि इस महत्वपूर्ण सम्पर्क मार्ग को लेकर जब जिलाधिकारी (DM), लोक निर्माण विभाग (PWD) के आला अधिकारियों या स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सवाल किया जाता है, तो किसी के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता। अलाइनमेंट (सड़क की दिशा) तक तय न होने के कारण मामला पूरी तरह से विवादित हो चुका है। अधिकारियों की यह खामोशी साफ संकेत दे रही है कि प्रोजेक्ट में एक बार फिर भारी प्रशासनिक मिसमैनेजमेंट है।
जमीन अधिग्रहण और वन विभाग का पेंच
सूत्रों के मुताबिक, अभी तक केवल स्लोपिंग एप्रोच के लिए वन विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मिल पाई है। इसके आगे की बची हुई लंबी सड़क के लिए न तो अभी तक दिशा तय हुई है और न ही किसानों की उपजाऊ ‘खेत-हरि’ भूमि के अधिग्रहण का ठोस प्रस्ताव तैयार हुआ है। जमीन अधिग्रहण के आपत्ति और अनापत्ति की इस पूरी प्रक्रिया से पहले राज्यपाल की अधिसूचना का गजट जारी होना अनिवार्य है। प्रशासनिक सुस्ती की जो रफ्तार आज है, उसे देखकर स्थानीय जनता को डर है कि इस पुल से गुजरने का सपना एक बार फिर ‘अगली सरकार’ के इंतजार की भेंट चढ़ जाएगा।
24 साल बाला इतिहास दोहरने का डर
क्षेत्रीय लोग इस पूरे घटनाक्रम को करीब पौने दो दशक पहले (राजीव गांधी के समय) हुए उस राजनीतिक ड्रामे से जोड़कर देख रहे हैं, जिसमें दो राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ रहा। मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार ने 12साल पहले काम शुरू कराकर जनता में उम्मीद तो जगाई, लेकिन 16साल बाद फिर लग़ रहा है कहीं 24साल का इतिहास न दोहर जाए क्योंकि यूपी सरकार के हिस्से के दो बड़े काम—सम्पर्क मार्ग की दिशा तय करना और भूमि अधिग्रहण पूरा करना—अब तक ठप पड़े हैं। बिना एप्रोच रोड के करोड़ों की लागत से बन रहा यह पुल महज़ एक ढांचा बनकर रह जाएगा, जिसका इस्तेमाल करना जनता के लिए दुष्कर होगा।















