*कहानी लेखन वर्कशॉप तीसरा दिन
**तीन दिन के माहौल ने प्रशिक्षुओं को कहानी गढ़ना सिखा दिया
*’हिंदी कहानी ने सवा सौ सालों में ही नाटक व दूसरी विधाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है।’
आगरा। तीन दिन की कहानी लेखन वर्कशॉप ऐतिहासिक सफलता के साथ संपन्न हुई। वर्कशॉप का आयोजन साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’,सांस्कृतिक संस्था ‘रंगलीला’ व सामाजिक संगठन ‘शीरोज हैंगआउट’ ने किया।
वर्कशॉप में दो क्लासिकल कहानियों का विश्लेषण किया गया।पहली कहानी हंगेरियन भाषा के सुप्रसिद्ध कथाकार लायोष जिलाही थे। ‘यान कोवाच का अंत’ शीर्षक वाली उनकी इस कहानी का विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि कहानी की केंद्रीय पृष्ठभूमि में लेखक ने कहा है कि “मृत्यु किसी भव्य घोषणा के साथ नहीं आती। यह भी जरूरी नहीं है कि मरने वाले का नाम सदा के लिए मिट जाए। किसी व्यक्ति को याद करना और किसी का नाम याद करना दोनों अलग अलग चीजें हैं।एक साधारण व्यक्ति व लेखक में जो बड़ा फर्क है वह दुनिया को देखने का है। दुनिया को देखने की कला ही कहानी कहना है।”
दूसरी क्लासिकल कहानी सहादत हसन मंटो की ‘खोल दो’ थी।
कहानी का विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ कहानीकार विभांशु दिव्याल ने कहा कि “यह कहानी इस बात का प्रतीक है कि मनुष्यता व पाशविकता में बड़ा फर्क होता है। यह इस विचार की स्थापना भी करती है कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।”
वरिष्ठ आलोचक प्रियम अंकित ने कहा कि “कुल सवा सौ साल के अपने जीवन में हिंदी कहानी ने अत्यंत महत्वपूर्ण दर्जा हासिल कर लिया है। उसने नाटक व दूसरी विधाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया। साहित्य में विचारधारा उसी तरह आती है जैसे आटे में नमक”।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए उर्दू लेखिका नसरीन बेगम ने कहा कि “अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कुरुतल –एन– हैदर और शहरयार जैसे उस्तादों (शिक्षकों) तथा इस्मत चुगताई जैसी अतिथि प्राध्यापकों के सानिध्य ने ऐसे माहौल को पैदा किया कि मुझ जैसे अनेक लड़के लड़कियां साहित्य लिखने के लिए प्रेरित हुए।” उन्होंने उम्मीद जताई कि वर्तमान वर्कशॉप व भविष्य में होने वाली इसकी फॉलोअप कार्यवाईयाँ युवाओं को कुछ वैसा ही माहौल देंगीं।
भोजनावकाश के बाद का सत्र प्रैक्टिकल कक्षाओं का था। इस सत्र का संयोजन करते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक जयप्रकाश ने प्रशिक्षुओं को कुछ ‘टास्क’ दिए और छोटी छोटी कहानियां गढ़ने के लिए प्रेरित किया।
लगभग तीस नए नकोरे प्रशिक्षु वर्कशॉप में आए, पहली बार उन्होंने महसूस किया कि कहानी की परिकल्पना के तत्व तो उनके भीतर मौजूद थे। इसका लेकिन उन्हें कभी एहसास नहीं हुआ। मौजूदा परिवेश ने उनके इन्हीं तत्वों को बाहर निकाल कर ला खड़ा किया।
वर्कशॉप का समापन करते हुए वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल ने जल्द ही दोबारा मिलने का भरोसा दिया।
धन्यवाद ज्ञापन रामभरत उपाध्याय ने किया। वर्कशॉप की व्यवस्था में अजय तोमर, रंजीत गुप्ता,अर्निका माहेश्वरी,दिनेश सुथार,मनीषा शुक्ला आदि का सहयोग रहा।
प्रवक्ता: महेश धाकड़, रामभरत उपाध्याय, अजय तोमर.















