उवाच
आस्था का बाजारीकरण और भोले की खरी खरी

शिवालय.आज का मानव ईश्वर को अपनी कसौटियों पर कसने की भूल कर रहा है। खाली समय में कभी आस्था की परीक्षा लेना, तो कभी अपनी सांसारिक इच्छाओं के लिए ईश्वर को आजमाना—यही आज की नियति बन चुकी है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि देवालयों और तपोभूमियों की मूल आत्मा कहाँ लुप्त होती जा रही है? महादेव के पावन आवासों और संतों के शिविरों को जिस तरह सांसारिक हितों के लिए आवंटित किया जा रहा है, वह आस्था के मूल स्वरूप पर एक गहरा आघात है।इतिहास गवाह है कि जो धरा स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृष्ण की लीलाओं की साक्षी रही, वहाँ आज भी जन्मस्थानों के विवाद थमे नहीं हैं। आदि शंकराचार्य जैसे महान आचार्यों ने देश की चारों दिशाओं को एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सूत्र में पिरोने के लिए पीठों की स्थापना की थी। उनका उद्देश्य बिखरे हुए जन-मानस के तन और मन को एकाग्र करना था। परंतु आज, इन विवादों से विलग होकर हर कोई अपनी स्वार्थ की धूनी अलग रमाए बैठा है। यह कर्म और फल (होनी, करनी, भरनी) के उस सनातन सिद्धांत की अनदेखी है, जो हमें विवादों से ऊपर उठकर आत्म-कल्याण की राह दिखाता है।सबसे विचारणीय विषय हमारे तीर्थों का बदलता स्वरूप है। विकास और भव्य ‘कॉरिडोर’ की आड़ में देवालयों को पवित्र साधना स्थल के बजाय केवल ‘पर्यटन स्थल’ में तब्दील किया जा रहा है। जब आस्था मनोरंजन और प्रदर्शन का जरिया बन जाए, तो उस स्थान की दिव्यता स्वतः ही समाप्त होने लगती है। हमारी पुरातन वास्तु-विद्या केवल पत्थरों का ढांचा नहीं थी, वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा को संचित करने का एक विज्ञान थी। योजनाबद्ध तरीके से इस वास्तुकला को नष्ट करना और इस प्रक्रिया में धांधली करना कालचक्र को निमंत्रण देने जैसा है। महादेव की त्रिनेत्र-दृष्टि सब देख रही है, और प्रकृति की इस वास्तुकला से खिलवाड़ का परिणाम मनुष्य को ही भुगतना होगा। समय आ गया है कि हम विकास की अंधी दौड़ में अपनी आध्यात्मिक चेतना को न खोएं।
शंकर देव तिवारी















