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धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज    स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी, आलेख शंकर देव तिवारी

धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज

स्वतंत्र #भारत के प्रथम कैदी !

 

14 अगस्त 1947 की वह रात भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण रातों में से एक थी। देश आधी रात को आजाद होने वाला था। दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराने की तैयारी चल रही थी। जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत में पहला भाषण देने वाले थे। लेकिन उसी रात, देश के एक कोने में, एक सनातनी संत और उनके सहयोगी “भारत अखंड हो” के नारे लगाते हुए गिरफ्तार कर लिए गए।

 

वे संत और कोई नहीं, धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज थे।

और वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी बने।

स्वामी करपात्री जी का परिचय…

स्वामी करपात्री जी का जन्म 11 अगस्त 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन का नाम हरिनारायण ओझा था। नौ वर्ष की आयु में विवाह हो गया, लेकिन वैराग्य की तीव्र भावना के कारण उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में गृह त्याग कर दिया।

उन्होंने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी से संन्यास दीक्षा ली।

दीक्षा के बाद उनका नाम हरिहरानंद सरस्वती पड़ा। वे हाथ में ही भिक्षा लेकर खाते थे, इसलिए लोक में “करपात्री”नाम से प्रसिद्ध हो गए। शास्त्रों में उनकी अद्भुत पकड़ और अटल आस्था के कारण उन्हें धर्मसम्राट तथा अभिनव शंकर कहा जाने लगा।

धर्मसंघ की स्थापना और अखंड भारत का अभियान…

1940 में विजयादशमी के दिन स्वामी करपात्री जी ने अखिल भारतीय धर्मसंघ की स्थापना की। धर्मसंघ का मूल मंत्र था….

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।

जब मुस्लिम लीग ने 1940 में लाहौर में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया, तब स्वामी करपात्री जी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि कांग्रेस अंततः इस मांग को स्वीकार कर लेगी। उन्होंने पूरे देश में अखंड भारत के पक्ष में सैकड़ों सभाएँ आयोजित कीं। भारत अखंड हो का नारा धर्मसंघ का प्रमुख घोष वाक्य बन गया। जो आज भी प्रासंगिक और प्रचलन में है।

जनवरी 1947 में उन्होंने घोषणा की कि, यदि सरकार गौहत्या बंद करने, अधार्मिक बिलों को वापस लेने और भारत की अखंडता बनाए रखने की मांगें स्वीकार नहीं करेगी, तो वे धर्मयुद्ध आरंभ करेंगे। अप्रैल 1947 में उन्होंने स्पष्ट पाँच माँगें रखीं थी…

1. भारत अखंड हो।

2. गोवध बंद हो।

3. अधार्मिक बिल रद्द हों।

4. मंदिरों की मर्यादा सुरक्षित रहे।

5. विधान शास्त्रीय हो।

14 अगस्त 1947 की रात !…

14 अगस्त 1947 की रात को धर्मसंघ के कार्यकर्ता विभिन्न स्थानों पर भारत अखंड हो के नारे लगाते हुए जुलूस निकाल रहे थे। वे भारत के विभाजन को राष्ट्र के साथ विश्वासघात मानते थे। उसी रात पुलिस ने स्वामी करपात्री जी महाराज और उनके कई सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।

उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया। 15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी का उत्सव मना रहा था, तब धर्मसम्राट लाहौर जेल की कोठरी में बंद थे। कुछ स्रोतों के अनुसार वह वही जेल थी , जहाँ भगत सिंह ने अपने अंतिम दिन बिताए थे। जेल में उन्हें कठोर यातनाएँ दी गईं।

 

इस प्रकार स्वामी करपात्री जी स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी बने। उनके साथ सैकड़ों धर्मसंघी कार्यकर्ता भी जेल गए। धर्मयुद्ध लगभग नौ महीने तक चला। इस दौरान पाँच हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।

 

ऐतिहासिक महत्व..!

स्वामी करपात्री जी का यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं था। उनके अनुसार भारत कोई राजनीतिक इकाई मात्र नहीं, बल्कि धर्मभूमि और पुण्यभूमि है। देश का विभाजन केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी था। वे मानते थे कि सत्ता हस्तांतरण के नाम पर राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए।

आजादी के बाद भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा। 1948 में उन्होंने अखिल भारतीय रामराज्य परिषद की स्थापना की। गौरक्षा आंदोलन, हिंदू कोड बिल का विरोध और सनातन धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए वे जीवन भर सक्रिय रहे।

14 अगस्त 1947 की वह रात इतिहास की मुख्यधारा में लगभग अनकही रह गई। लेकिन धर्मसंघ और सनातन परंपरा के अनुयायियों के लिए यह रात अखंड भारत के संघर्ष का प्रतीक है। जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब एक संत जेल में बैठा यह संदेश दे रहा था कि, आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की अखंडता और धर्म की रक्षा भी है।

धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का यह संघर्ष आज भी उन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो अखंड भारत और सनातन मूल्यों में विश्वास रखते हैं।

क्या यह सत्य हम सनातनियों से नहीं छिपाया गया। हममें से कितने लोग इस सत्य को जानते हैं।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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