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जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति संरक्षण जरूरी — ज्ञानेन्द्र रावत 

जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति संरक्षण जरूरी — ज्ञानेन्द्र रावत

 

प्रकृति ईश्वर का अमूल्य उपहार है। हमारा अस्तित्व इसी प्रकृति का परिणाम है। भारतीय दर्शन, पुराण और हमारी सनातन संस्कृति में भी प्रकृति के महत्व और उसके संरक्षण का उल्लेख है। हमारी संस्कृति भी सदैव से प्रकृति की संरक्षक और उसकी पूजक रही है। हमारे धर्म ग्रंथों में वन, नदी, जल, अन्न,वनस्पतियों, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों यहां तक मिट्टी तक यानी हर सजीव -निर्जीव वस्तु की न केवल प्रशंसा की गयी है,बल्कि पूजा के बहाने उसके संरक्षण का संदेश दिया है। लेकिन समझ नहीं आता कि हम प्रकृति संरक्षण से विमुख क्यों हो रहे हैं।

 

इस बारे में देश के ख्यात पर्यावरणविद एवं वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र रावत ने बातचीत के दौरान बताया कि मूल रूप से प्रकृति संरक्षण का अर्थ है पारिस्थितिक तंत्र, प्रजातियों और भूदृश्यों का व्यवस्थित और जिम्मेदार प्रबंधन ताकि भावी पीढ़ियों के लिए उनका अस्तित्व और कार्य प्रणालियों को सुनिश्चित किया जा सके जो हमारा नैतिक कर्तव्य और दायित्व भी है। लेकिन दुख इस बात का है कि हम अत्याधिक उपयोगी, भौतिकवादी और शहरीकृत जीवनशैली के मोहपाश में बंधकर अपने बेलगाम निजी स्वार्थ, हित, भौतिक सुख- सुविधाओं की अंधी चाहत के चलते प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह सब हमारी दैनंदिन की दिनचर्या का अंग हो गया है। हम अपने जीवन में केवल वर्तमान के लाभ को दृष्टिगत प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा इस्तेमाल-दोहन कर रहे हैं, जीव-जंतुओं और प्राकृतिक संतुलन के प्रति न केवल हमारे मन में सम्मान की भावना रह गयी है बल्कि उनके ह्वास में योगदान देने में भी सहभागी बन रहे हैं, और तो और कंक्रीट के जंगलों के मोहपाश में प्रकृति से दूरी बनाने में हम गर्व का अनुभव कररहे हैं जबकि हम ये भूल जाते हैं कि यह सब हमारे जीवन के आधार हैं।

 

आज हमने अपने इसी लोभ और स्वार्थ के चलते जीवनदायी नदियों को प्रदूषित कर दिया है, कुछ विलुप्ति के कगार पर हैं, कुंए, बाबडी, तालाबों का अस्तित्व समाप्त प्राय: है, वन्यजीवों और प्राकृतिक संतुलन में अहम भूमिका निबाहने वाले गिद्धों की प्रजाति संकट में है, कीट-पतंगों, पक्षियों के साथ घर-आंगन में चहकने-फुदकने वाली गौरय्या के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं, विकास के नामपर वन विनाश चरम पर है, यह हमारे जिले की ही नहीं,देश और समूची दुनिया में जारी है। दुखद यह है कि कोरोना काल से भी सरकारों ने कोई सबक नहीं सीखा है। जबकि मत्स्य पुराण में वर्णित है कि दस कुंओं के बराबर एक बाबडी, दस बावडियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है। जबकि आज के वैज्ञानिक युग में भी वृक्ष को प्रकृति संरक्षण का सबसे अहम आधार माना गया है। वेदों में भी प्रकृति ही नहीं, शरीर के तीनों दोषों यानी वात, पित्त और कफ के संतुलन एवं असंतुलन के लिए पंचतत्वों यानी अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी एवं आकाश का स्तवन किया है। हमारे पुरखे और ऋषि-मुनि ने भी प्रकृति को एक मां, एक पिता और सबसे बढ़कर एक गुरू की तरह पूजा है। यही नहीं प्रकृति ने समूची दुनिया को बेमिसाल अद्वितीय और अद्भुत रचनायें उपहार में दी हैं। इसलिए आइये इस प्रकृति संरक्षण दिवस पर अपनी परंपराओं की ओर पुन: लौटते हुए प्रकृति का वंदन – नमन करें और यह संकल्प लें कि हम प्रकृति के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि उसके सह – अस्तित्व के अनुगामी होकर उसका संरक्षण करेंगे।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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