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लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ‘खस्ताहाल’ बुनियादी ग्रामीण पत्रकारों के आर्थिक शोषण पर उठे एक महत्वपूर्ण गंभीर सवाल, रिपोर्ट हरिओम बाजपेई, संलग्न निशा कांत शर्मा एडवोकेट

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ‘खस्ताहाल’ बुनियादी ग्रामीण पत्रकारों के आर्थिक शोषण पर उठे एक महत्वपूर्ण गंभीर सवाल।

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खबरों के दम पर करोड़ों कमाने वाले मीडिया घराने ग्राउंड जीरो के पत्रकारों को नहीं दे रहे मानदेय।

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‘विज्ञापन लाओ कमीशन पाओ’ की नीति से पत्रकारिता की साख पर संकट, मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने की मांग।

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हरिओम बाजपेई

पीलीभीत।देश और समाज की हर छोटी-बड़ी समस्या को शासन प्रशासन तक पहुंचाने वाला पत्रकार आज खुद अपनी आजीविका के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। शहर ग्रामीण और जिला स्तर पर अपनी जान जोखिम में डालकर

अपनी जेब से पेट्रोल और इंटरनेट का खर्च वहन कर खबरें लाने वाले स्ट्रिंगर्स और फ्रीलांस पत्रकारों को बड़े मीडिया घरानों द्वारा कोई फिक्स सैलरी या मानदेय नही देना बेहद चिंताजनक है। श्रम कानूनों और मजीठिया वेज बोर्ड की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए अखबार मालिकों ने पत्रकारों को समाचार संकलन के बजाय एक

विज्ञापन एजेंट बनने पर मजबूर कर दिया है। यह नीति न केवल श्रम का खुला शोषण है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को जान-बूझकर कमजोर करने की एक गहरी साजिश भी है। श्रम कानून का खुला शोषण मुख्य उत्पाद लाने वाले के ही हाथ खालीअखबारों

और बड़े न्यूज़ चैनलों के लिए धरातल की खबरें ही उनका मुख्य उत्पाद होती हैं, जिसके दम पर उन्हें सरकारी और निजी क्षेत्रों से करोड़ों रुपये के विज्ञापन मिलते हैं। विडंबना यह है कि जो पत्रकार रात-दिन एक करके यह ‘उत्पाद’ तैयार करता है, उसे संस्थान फूटी कौड़ी भी नहीं देती है। केवल एक ‘प्रेस आईडी कार्ड’ और स्थानीय रसूख का लालच देकर उनसे मुफ्त में मजदूरी कराई जा रही है, जो पूरी तरह से अनैतिक और गैर-कानूनी है। वर्तमान समय मेंआजकल मीडिया घरानों ने सैलरी देने से बचने के लिए एक नया और आत्मघाती रास्ता निकाल लिया है। जिला स्तर के पत्रकारों पर अनिवार्य रूप से विज्ञापन लाने का दबाव बनाया जाता है और उन्हें 10% से 30% तक के कमीशन पर निर्भर कर दिया गया है। इसका सीधा नुकसान यह हो रहा है कि एक पत्रकार का मुख्य काम जनता जनार्दन की आवाज उठाना पीछे छूट जाता है और वह अपने सर्वाइवल के लिए बिजनेस मैन बनने पर मजबूर हो जाता है।

जब एक पत्रकार को अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे गाड़ी का पेट्रोल, मोबाइल रिचार्ज और परिवार के पालन पोषण के लिए भी उचित पारिश्रमिक उसे नहीं मिलता, तो व्यवस्था में भ्रष्टाचार और ‘पेड न्यूज’ का खतरा अनिवार्य रूप से बढ़ जाता है। मुख्य मीडिया संस्थान द्वारा आर्थिक रूप से लाचार छोड़ दिए जाने के कारण पत्रकारों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाता है, जिससे पत्रकारिता की निष्पक्षता और साख पूरी तरह प्रभावित होती है।

देश में पत्रकारों के अधिकारों और न्यूनतम वेतन के लिए बने मजी

ठिया वेज बोर्ड को जिला और तहसील स्तर के स्ट्रिंगर्स पर भी कड़ाई से लागू किया जाए। कागजों पर कुछ और, हकीकत में कुछ और दिखाने वाले संस्थानों की जांच हो।

श्रम कानूनों के तहत कानूनी सुरक्षा ग्रामीण पत्रकारों को ‘असंगठित श्रमिक या ‘वर्किंग जर्नलिस्ट’ का दर्जा देकर उनके लिए न्यूनतम मानदेय और स्वास्थ्य-जीवन बीमा सुनिश्चित किया जाए। एक तरफ बड़े घरानों के शोषण से तंग आकर अब ग्रामीण पत्रकार स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और यूट्यूब न्यूज़ चैनलों की तरफ बढ़ रहे हैं। सरकार को इन स्वतंत्र पत्रकारों को भी मान्यता और सुरक्षा देनी चाहिए। बिना किसी आर्थिक सहयोग या मानदेय के पत्रकारों से काम कराना न सिर्फ मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि एक स्वतंत्र पत्रकार तभी तक निष्पक्ष और निर्भीक रह सकता है, जब तक उसे अपनी आजीविका के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। यदि समय रहते जिला प्रशासन और सूचना विभाग ने इस गंभीर शोषण पर संज्ञान नहीं लिया तो ग्रामीण स्तर पर जनता की आवाज उठाने वाली पत्रकारिता पूरी तरह दम तोड़ रही है।

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बॉक्स में

नेताओ, अधिकारियो की प्रेस वार्ता तक ही सीमित मत रहो आज की जरूर पत्रकारिता है। नेताजी और अधिकारी का एक मैसेज मिलते ही दौड़ पडे। अब दौड़ना बंद कर दो और अपने सामाजिक आर्थिक अधिकारों के लिए यदि लिखना खून से पड़ जाए तो वह लिखो जो तुम्हें नजर आ रहा हो तारीफ नहीं सिर्फ तारीख लिखो जो एक दिन इतिहास के पन्ने में कैद हो जाएगी।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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