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वंदे मातरम् : राष्ट्रगीत से विभाजन का हथियार(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

 

*वंदे मातरम् : राष्ट्रगीत से विभाजन का हथियार*
*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*

संसद के जिस मानसून सत्र की शुरूआत, युवा पीढ़ी के असंतोष के अभूतपूर्व प्रदर्शन के रूप में ‘संसद मार्च’ के साथ हुई, जिससे उठे सवालों की बारिश में मानसून सत्र एक तरह से पूरी तरह से बह ही गया। प्राय: ठप्प ही रही संसद से शोर-शराबे के बीच मोदीशाही ने जिन विधेयकों पर लगभग किसी भी चर्चा के बिना संसद से मोहर लगवाने की औपचारिकता पूरी कर ली थी, उनमें ‘वंदे मातरम्’ को कथित रूप से उसका उचित सम्मान देने के लिए लाया गया विधेयक भी शामिल था। राष्ट्रीय सम्मान अनादर निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 नाम का यह विधेयक, जो संक्षेप में ‘राष्ट्रगीत’ वंदे मातरम् के अनादर को ‘राष्ट्रगान’ के बराबर, दंडनीय अपराध बनाने का प्रावधान करता है, 24 जुलाई को राज्यसभा में पेश किया गया और बिना किसी विस्तृत चर्चा का मौका दिए और विपक्ष के कड़े विरोध के बावजूद, 29 जुलाई को राज्य सभा से और 30 जुलाई को लोक सभा से इस पर मोहर लगवा ली गयी। राष्ट्रपति ने भी फौरन इस पर मोहर लगाकर इसे देश का कानून बना दिया।

इस कानून के बनने के बाद गुजरे मुश्किल से तीन हफ्तों के घटनाक्रम ने राजनीतिक विपक्ष की ही नहीं, दूसरे अनेक राजनीतिक प्रेक्षकों की इसकी आशंकाओं की पुष्टि करने का ही काम किया है कि, इसके पीछे मंशा राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ का आदर करने की नहीं, उसे संघ-भाजपा परिवार की सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति का हथियार बनाने की है। संघ-भाजपा के दुष्प्रचार के सामने दुर्लभ दृढ़ता का प्रदर्शन करते हुए जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने ऐलान कर दिया कि कांग्रेस वंदे मातरम् के उसी प्रारूप को (पहले दो बंद) स्वीकार करेगी, जिसे राष्ट्रीय आंदोलन की आम सहमति की अभिव्यक्ति के रूप में 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने स्वीकार किया था और जिसे उसी आम सहमति की निरंतरता में आगे चलकर संविधान सभा ने भी ‘राष्ट्र गीत’ के रूप में स्वीकार किया था, संघ परिवार ने बाकायदा इसे आने वाले समय में अपने सांप्रदायिक प्रचार का एक प्रमुख हथियार बनाने का जैसे ऐलान ही कर दिया है। इस अभियान में पूरा जोर यह साबित करने पर है कि वंदे मातरम् के सभी छ: बंद गाना स्वीकार नहीं करने का अर्थ है — मुस्लिम तुष्टीकरण। यहां तक कि इस प्रचार में उन्होंने कांग्रेस को ‘लीग’ कहना भी शुरू कर दिया है।

इस खेल का मकसद है, शासन द्वारा अनुमोदित तथा कानूनी सजा का डर दिखाकर, गैर-मूर्तिपूजकों पर, जिनमें तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलावा बहुत से हिंदू तथा अधार्मिक भी शामिल हैं, एक मूर्ति-पूजा के संकेतों से भरा गीत थोपने के जरिए, अल्पसंख्यकों को और अधिकारहीन होने का अहसास कराया जाए और अपने राजनीतिक विरोधियों को ‘अल्पसंख्यकपरस्त’ बताकर, अपने पक्ष में बहुसंख्यकों का राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि ‘वंदे मातरम्’ के आदर का पाखंड रचकर, उसे वास्तव में एक सांप्रदायिक हथियार में तब्दील करने का संघ-भाजपा का खेल एक हद तक तो तभी उजागर हो गया था, जब मोदी मंत्रिमंडल ने किसी भी तरह की व्यापक चर्चा के बिना ही अचानक राष्ट्र गीत, ‘वंदे मातरम्’ की डेढ़ सौवीं सालगिरह के वर्ष का, देश भर में जोर-शोर पालन करने का ऐलान किया था। इसके चंद रोज बाद ही, 7 नवंबर 2025 को राजधानी में इन आयोजनों का उदघाटन करते हुए अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इस वर्ष के पालन का असली मकसद, राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा के, जिसका नेतृत्व तब की कांग्रेस करती थी, आशयों, मंतव्यों तथा चिंताओं के सांप्रदायिक विकृतिकरण को आगे बढ़ाना और राष्ट्रीय आंदोलन की समावेशी सर्वानुमति की दुर्व्याख्या करना ही था। हैरानी की बात नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन के, ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे ही कांग्रेस के सभी आयोजनों में गाए जाने के निर्णय को, तथाकथित ‘अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण’ का सबूत ही नहीं बना दिया, बल्कि इस निर्णय को देश के विभाजन की नींव डालने वाला भी बना दिया।

यह तथ्य अब काफी हद तक आम जानकारी में है कि बंकिमचंद्र ने, जो ब्रिटिश राज के डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, ‘वंदे मातरम्’ की रचना दो चरणों में की थी। साहित्य के जानकारों के अनुसार इस गीत पहला हिस्सा, जो बंगाल की धरती या बंग माता के प्रशस्तिगान के रूप में है और कोई भी पाठक उससे मातृभूमि की वंदना के रूप में खुद को जोड़ सकता है, बाद वाले हिस्से से न सिर्फ स्वतंत्र है, बल्कि बिल्कुल अलग ही है, अपनी भाषा में भी और भाव में भी। बाद वाला हिस्सा, कुछ वर्षों के अंतराल से, तब जोड़ा गया जब बंकिमचंद्र ने अपने बहुचर्चित उपन्यास, ‘आनंदमठ’ में पिरोने के लिए इस कविता का विस्तार किया। ‘आनंदमठ’ की थीम के अनुरूप, बाद के हिस्से में बंग माता की कल्पना में हिंदू प्रतीकों तथा देवी रूपों की प्रधानता है। ‘वंदे मातरम्’ पहली बार ‘आनंदमठ’ के हिस्से के रूप में ही लोगों के सामने आया था।

आनंदमठ और खासतौर पर ‘वंदे मातरम्’ की लोकप्रियता में बंगाल के क्रांतिकारी ग्रुपों के प्रभाव ने काफी मदद की थी। उन्नीसवीं सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में ये क्रांतिकारी ग्रुप मुख्यत: हिंदू थे और देवी पूजा के कर्मकांड से भी काफी प्रभावित थे। बाद में धीरे-धीरे क्रांतिकारी ग्रुप धार्मिक विश्वासों के खोल से बाहर आए। बीस के दशक के मध्य से भगतसिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारी आंदोलन को समाजवादी लक्ष्यों से जोड़ा और भगत सिंह ने खुद ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लिखकर क्रांतिकारियों के लिए धर्म के सहारे को अनावश्यक करार दे दिया। बहरहाल, 1905 में जब बंगाल के विभाजन के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन उठा, बंगाल में ‘वंदे मातरम्’ गीत और उससे भी बढ़कर वंदे मातरम् का नारा, क्रांतिकारी घोष बन चुका था।

दूसरी ओर, राष्ट्रीय आंदोलन की समावेशी प्रकृति के तकाजे भी पहले विचार के स्तर पर और फिर आंदोलन के स्तर पर पहचाने जा रहे थे। 1896 में जब कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार, रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ही बनायी स्वर रचना के साथ ‘वंदे मातरम्’ गाया, उसका पहला हिस्सा ही उसमें शामिल किया गया, जिसमें दो बंद शामिल थे, जिन्हें बाद में संविधान सभा ने ‘राष्ट्रगीत’ का दर्जा दिया। जैसा कि 1936-37 में कांग्रेस के माध्यम से राष्ट्रीय आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ की उपयुक्तता पर राष्ट्रीय आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने गंभीरता से चर्चा की, उस समय जैसा कि टैगोर ने अपने एक पत्र में लिखा था, एक ‘ब्राह्मो’ होने के नाते, इस गीत के बाद वाले मूर्तिपूजा के द्योतक हिस्सों से उन्हें भी परेशानी थी। स्वाभाविक रूप से बहुधार्मिक राष्ट्रीय जन-आंदोलन के सामने आने के साथ, यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया था कि राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में खास धार्मिक कर्मकांड के जुड़े प्रतीकों का अपनाया जाना, अल्पसंख्यकों को दूर करने का काम नहीं करेगा?

इसी मंतव्य से 1936 में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने, वंदे मातरम् के प्रश्न पर विचार करने के लिए, रवींद्रनाथ टैगोर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। इसी कमेटी की सिफारिश के आधार पर, 1937 में कोलकाता में कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव को स्वीकार कर तय किया कि, राष्ट्रीय आयोजनों में हमेशा ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो बंद गाए जाएंगे। यह आजादी की एक महत्वपूर्ण पुकार के रूप में ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान के हिस्से के तौर पर यह भी सुनिश्चित करना था कि वह समावेशी देशप्रेम का प्रतीक बने, धार्मिक विभाजनकारी राष्ट्रवाद का नहीं। बेशक उस समय भी संघ परिवार, जिसमें तब हिंदू महासभा अग्रणी थी, हिंदू राष्ट्र की अपनी मांग के अनुरूप राष्ट्रीय आंदोलन से तो इसकी मांग कर रहा था कि गैर-मूर्तिपूजकों के असुविधा महसूस करने को अनदेखा कर, पूरे गीत को ही राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में थोपा जाए, लेकिन उसने अपने संगठन में कभी ‘वंदे मातरम्’ को अपनाने लायक नहीं समझा। 1925 में अपनी स्थापना के बाद आरएसएस ने अपनी ही मराठी प्रार्थना अपनायी और बाद में ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमे’, पर ‘वंदे मातरम्’ को कभी नहीं अपनाया। हैरानी की बात नहीं है कि स्वतंत्रता के बाद, जब संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्र गान का निर्णय किया था, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाइजर में प्रकाशित एक लेख में न सिर्फ राष्ट्र गान को ‘अधिकारियों के मनोरंजन का आइटम’ करार दिया गया था, बल्कि तिरंगे के विरुद्घ दलीलें पेश करते हुए, यह भी साफ कर दिया गया था कि संघ समावेशी राष्ट्रीय प्रतीकों के विचार के ही खिलाफ है।

‘वंदे मातरम्’ अब उनके हाथों में विभाजन का हथियार है। और इस हथियार का इस्तेमाल करने की उनकी उतावली इतनी है कि संसद से पारित कानून में वंदे मातरम् पूरा गाने की छोड़िए, गाने की भी कोई बाध्यता नहीं है, फिर भी गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के ही बल पर, पूरे देश पर यह बाध्यता थोपने की अवैध मुहिम चलायी जा रही है।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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