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राम मंदिर के चंदे से लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता तक उठ रहे सवाल, विपक्ष के आरोपों और सरकार की जवाबदेही पर बहस जरूरीBMF News

*‘देते हैं भगवान को धोखा, इंसान को क्या छोड़ेंगे*’

 

*पुराने फिल्मी गीत के बोलों से सत्ता पर तीखा कटाक्ष, धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति में कहां खो गए रोजगार व शिक्षा के सवाल?*

 

*राम मंदिर के चंदे से लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता तक उठ रहे सवाल, विपक्ष के आरोपों और सरकार की जवाबदेही पर बहस जरूरी*

 

शिवम सोलंकी| विशेष राजनीतिक टिप्पणी*

 

वक्त बदलता है, चेहरे बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन राजनीति के तौर-तरीकों पर उठने वाले सवाल अक्सर वही रहते हैं। आज देश की राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर बरसों पुराना एक फिल्मी गीत याद आता है— “देते हैं भगवान को धोखा, इंसान को क्या छोड़ेंगे।” इसी तरह एक अन्य गीत के बोल हैं— “कसमें, वादे, प्यार, वफा, सब बातें हैं, बातों का क्या।” कभी सिनेमा के पर्दे पर फिल्माए गए ये गीत आज की राजनीति पर कटाक्ष करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।गीतकारों ने जब ये पंक्तियां लिखी होंगी, तब शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि भविष्य में इन्हें सत्ता के दावों, चुनावी वादों और राजनीतिक जवाबदेही पर सवाल उठाने के लिए उद्धृत किया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा राजनीति के आलोचकों का आरोप है कि सत्ता में बने रहने की रणनीति में जनता के बुनियादी मुद्दों की तुलना में धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रवाद को अधिक प्रमुखता दी जाती है। हालांकि, इस आरोप का मूल्यांकन सरकार के वास्तविक फैसलों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

*राम मंदिर के चंदे पर सवाल तो जवाब भी पारदर्शी होना चाहिए*

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मंदिर निर्माण के लिए देशभर के लोगों ने श्रद्धापूर्वक आर्थिक योगदान दिया। ऐसे में मंदिर से संबंधित चंदे, जमीन के लेन-देन और आर्थिक पारदर्शिता को लेकर जब भी सवाल उठते हैं, तो उनका उत्तर स्पष्ट तथ्यों और दस्तावेजों के माध्यम से दिया जाना चाहिए।राम मंदिर से जुड़े कुछ जमीन के सौदों को लेकर पूर्व में विवाद और आरोप सार्वजनिक चर्चा का विषय बने। इन आरोपों पर राजनीतिक बयानबाजी भी हुई। लेकिन किसी आरोप को बिना प्रमाण के सिद्ध अपराध मान लेना उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित लेन-देन की परिस्थितियों, उपलब्ध दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर जनता को वास्तविक स्थिति बताई जाए।आस्था का अर्थ यह नहीं कि सवाल पूछने का अधिकार समाप्त हो जाए। भगवान के नाम पर चंदा देने वाला श्रद्धालु यह जानना चाहे कि उसके योगदान का उपयोग किस प्रकार हुआ, तो यह उसका स्वाभाविक अधिकार है। धार्मिक आस्था और वित्तीय जवाबदेही के बीच कोई विरोध नहीं होना चाहिए।यही लोकतंत्र की खूबसूरती है कि जनता सरकार से सवाल पूछ सकती है। यदि किसी मामले में आरोप गलत हैं, तो उनका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। और यदि कहीं अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। केवल आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच किसी मामले का दब जाना जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।

*हिंदुस्तान-पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम के बीच कहां गुम हो जाते हैं असली मुद्दे?*

भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, सीमा सुरक्षा और धार्मिक पहचान महत्वपूर्ण विषय हैं। देश की सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव पर चर्चा होनी भी चाहिए। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब चुनावी माहौल में इन विषयों को इतनी प्रमुखता मिल जाती है कि रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याएं पीछे छूटती दिखाई देती हैं।भारतीय जनता पार्टी के आलोचकों का आरोप है कि चुनाव के समय पाकिस्तान, बांग्लादेश, घुसपैठ और हिंदू-मुस्लिम संबंधों जैसे मुद्दों को बार-बार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया जाता है। जनता के सामने यह प्रश्न रखना जरूरी है कि क्या इन विषयों पर होने वाली बहस के साथ-साथ उसके दैनिक जीवन की समस्याओं का भी उतनी ही गंभीरता से समाधान किया जा रहा है?यदि सीमा सुरक्षा का प्रश्न है, तो सरकार को सुरक्षा व्यवस्था और घुसपैठ रोकने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देना चाहिए। यदि किसी समुदाय की सुरक्षा का प्रश्न है, तो कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। लेकिन किसी भी समुदाय के प्रति भय या नफरत को चुनावी लाभ का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए।देश की जनता को केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और परिणामों से संतुष्ट किया जाना चाहिए। हिंदू हो या मुस्लिम, गरीब हो या अमीर, किसान हो या मजदूर—हर नागरिक को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा चाहिए। इन बुनियादी आवश्यकताओं का कोई धार्मिक विकल्प नहीं है।

*दस साल से अधिक सत्ता, फिर भी युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती*

केंद्र में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार से जनता की अपेक्षाएं भी बड़ी होती हैं। युवाओं को उम्मीद रहती है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें सम्मानजनक रोजगार मिलेगा। माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर वर्षों तक पैसा खर्च करते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवा अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्ष लगा देते हैं। लेकिन भर्ती प्रक्रिया में देरी, रिक्त पदों को भरने की मांग और परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतें उनके भविष्य को लेकर चिंता पैदा करती हैं।सरकार को बताना चाहिए कि नियमित सरकारी पदों पर भर्ती की क्या स्थिति है, कितने पद खाली हैं, कितनी नियुक्तियां हुई हैं और लंबित भर्तियों को पूरा करने की समयसीमा क्या है।देश के युवाओं को रोजगार चाहिए, केवल आश्वासन नहीं। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें योग्यता के आधार पर निष्पक्ष चयन हो, भर्ती समय पर पूरी हो और नियुक्ति के बाद उनका भविष्य सुरक्षित रहे।सवाल केवल केंद्र सरकार से नहीं, राज्य सरकारों से भी पूछा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्यों में रोजगार की स्थिति का मूल्यांकन उपलब्ध आंकड़ों, भर्ती के रिकॉर्ड और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। यदि सरकारें विकास का दावा करती हैं, तो उन्हें रोजगार सृजन के ठोस परिणाम भी सामने रखने चाहिए।

*आउटसोर्सिंग के नाम पर ठेका प्रथा, युवाओं के भविष्य पर बड़ा सवाल*

सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की नियुक्ति एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है, जिस पर गंभीर बहस की आवश्यकता है। आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्ति कुछ सेवाओं में उपयोगी हो सकती है, लेकिन यदि नियमित पदों पर स्थायी भर्ती के स्थान पर लगातार ठेका आधारित नियुक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा और भविष्य प्रभावित हो सकता है।इस व्यवस्था में कर्मचारी अक्सर ठेकेदार या सेवा प्रदाता एजेंसी के माध्यम से काम करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उन्हें उचित वेतन, समय पर भुगतान, सामाजिक सुरक्षा और सेवा संबंधी अधिकार किस सीमा तक मिल रहे हैं?इसके साथ आरक्षण का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। नियमित सरकारी भर्तियों में लागू आरक्षण संबंधी प्रावधानों और आउटसोर्सिंग के माध्यम से होने वाली नियुक्तियों की व्यवस्था में अंतर हो सकता है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न प्रकार की नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी नियम किस प्रकार लागू होते हैं और संवैधानिक प्रावधानों की प्रभावी पालना कैसे सुनिश्चित की जाती है।दि स्थायी पदों पर भर्ती सीमित होती जाए और युवाओं को ठेकेदारों के माध्यम से कम सुरक्षा वाली नौकरियां मिलें, तो इसे रोजगार की समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। कहावत है— “आम के आम, गुठलियों के दाम।” राजनीतिक आलोचकों का तर्क है कि ठेका आधारित नियुक्तियों से सरकार पर स्थायी रोजगार की जिम्मेदारी कम पड़ सकती है, जबकि नौकरी की असुरक्षा का बोझ कर्मचारियों पर रहता है। इस आरोप की वास्तविकता का आकलन संबंधित विभागों की भर्ती नीतियों, सेवा शर्तों और आंकड़ों से किया जाना चाहिए।युवाओं को केवल काम देने की बात पर्याप्त नहीं है। उन्हें सम्मानजनक वेतन, नौकरी की स्थिरता और आगे बढ़ने के अवसर भी मिलने चाहिए।

*चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल, लोकतंत्र के लिए अहम परीक्षा*

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जनता का विश्वास तभी कायम रहता है, जब उसे लगे कि चुनाव निष्पक्ष होंगे और प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का समान अवसर मिलेगा।पश्चिम बंगाल और बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर उठे सवालों ने भी राजनीतिक बहस को तेज किया है। मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना आवश्यक है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटने की आशंका को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।यदि मतदाता सूची में संशोधन किया जा रहा है, तो उसके मानदंड स्पष्ट होने चाहिए। जिन लोगों के नाम हटाए जाने का प्रस्ताव है, उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। शिकायतों का निपटारा समयबद्ध हो और अंतिम सूची में शामिल तथा हटाए गए नामों के संबंध में आवश्यक जानकारी पारदर्शी तरीके से उपलब्ध होनी चाहिए।चुनाव आयोग के अधिकारियों की नियुक्ति, उनके निर्णयों और कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन किसी अधिकारी की निष्पक्षता या पक्षपात का निष्कर्ष केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर नहीं निकाला जाना चाहिए। इसके लिए निर्णयों, दस्तावेजों और लागू नियमों की जांच आवश्यक है।

*ज्ञानेश कुमार और ज्ञानेश के नाम को लेकर भी राजनीतिक* चर्चा में भ्रम से बचना जरूरी है। किसी अधिकारी के नाम, पद और अधिकार क्षेत्र की पुष्टि किए बिना उसके बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। चुनाव आयोग की निष्पक्षता का मूल्यांकन किसी एक व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि संस्था के निर्णयों, प्रक्रियाओं और सभी राजनीतिक दलों के प्रति उसके व्यवहार से होना चाहिए।यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में अनियमितताएं हुई हैं, तो उसे प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। चुनाव आयोग को भी शिकायतों का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता के साथ देना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता को दिखाई भी देनी चाहिए।

*‘सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का’—लेकिन लोकतंत्र में नियम सबके लिए समान हों*

एक पुरानी कहावत है— “सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का।” इसका अर्थ है कि जब किसी व्यक्ति को सत्ता या प्रभाव का संरक्षण प्राप्त हो, तो वह स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगता है।लोकतंत्र में यह कहावत किसी एक व्यक्ति या दल तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि सत्ता पक्ष को यह विश्वास हो जाए कि संस्थाओं पर उसके प्रभाव के कारण उससे कठिन सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तो जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है। इसी तरह विपक्ष को भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसके प्रत्येक आरोप को बिना जांच के सही स्वीकार कर लिया जाएगा।चुनाव आयोग हो, जांच एजेंसियां हों या प्रशासनिक संस्थाएं—उनकी विश्वसनीयता निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन से बनती है। किसी भी संस्था को राजनीतिक दलों के दबाव से मुक्त होकर कार्य करना चाहिए।जनता को यह जानने का अधिकार है कि मतदाता सूची में संशोधन क्यों हुआ, किन नियमों के तहत हुआ और जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनके पास अपील का क्या विकल्प है। इन सवालों के स्पष्ट जवाब ही चुनाव प्रक्रिया के प्रति विश्वास बढ़ा सकते हैं।

*उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता का फैसला जनता करेगी*

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को चुनौती मिलने या चुनाव में संभावित हार-जीत को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। यह कहना कि यदि आज चुनाव हों तो किसी दल को निश्चित रूप से करारी हार मिलेगी, तब तक एक राजनीतिक अनुमान ही है, जब तक उसके समर्थन में विश्वसनीय सर्वेक्षण या चुनाव परिणाम उपलब्ध न हों।लेकिन इतना निश्चित है कि जनता के बीच बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती प्रक्रिया, किसानों की समस्याएं, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे राजनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।यदि मतदाता सरकार के कामकाज से संतुष्ट होंगे, तो वे उसे समर्थन दे सकते हैं। यदि उन्हें लगेगा कि उनके सवालों का जवाब नहीं मिला, तो वे सत्ता परिवर्तन का विकल्प भी चुन सकते हैं। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है, किसी राजनीतिक दल का नहीं।भाजपा हो या कोई अन्य दल, किसी भी सरकार को यह नहीं मानना चाहिए कि धार्मिक पहचान, राष्ट्रवाद या राजनीतिक प्रचार के सहारे जनता के सवालों को हमेशा के लिए पीछे रखा जा सकता है। मतदाता अपने अनुभवों, अपेक्षाओं और समस्याओं के आधार पर निर्णय लेते हैं।

*जनता को नारों से ज्यादा जवाब चाहिए*

आज देश को ऐसी राजनीति की जरूरत है, जिसमें मंदिरों की आस्था का सम्मान हो, लेकिन चंदे की पारदर्शिता पर भी सवाल पूछे जा सकें। राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि हो, लेकिन उसके नाम पर बेरोजगारी और शिक्षा की समस्याएं अनदेखी न हों। चुनाव में जीत महत्वपूर्ण हो, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाए।सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक दलों के नारे बदलते रहते हैं और चुनावी मंचों पर किए गए वादे समय के साथ पुराने पड़ जाते हैं। लेकिन जनता की समस्याएं तब तक बनी रहती हैं, जब तक उनका समाधान नहीं होता।पुराने फिल्मी गीत की पंक्ति— *“देते हैं भगवान को धोखा, इंसान को क्या छोड़ेंगे”*—आज राजनीतिक जवाबदेही पर सवाल उठाने के लिए एक प्रतीक बन सकती है। हालांकि, किसी भी दल के बारे में अंतिम निष्कर्ष भावनाओं या गीतों से नहीं, बल्कि उसके कामकाज और प्रमाणित तथ्यों से ही निकाला जाना चाहिए।लोकतंत्र का असली अर्थ सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह रहना है। सरकार को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पारदर्शिता और निष्पक्ष चुनाव के सवालों का जवाब देना होगा। विपक्ष को भी आरोपों के साथ प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। और जनता को धर्म, जाति तथा राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर अपने भविष्य से जुड़े सवाल पूछने होंगे।क्योंकि अंततः चुनावी मंच पर चाहे कितने ही नारे गूंजें, देश का भविष्य तभी मजबूत होगा, जब सत्ता का केंद्र राजनीतिक कुर्सी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होगा।

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