आज की बात
रामलाल का खोका और चौराहे के चार पहरेदार
सुप्रभात!
किसी कवि की एक रचना केवल कुछ पंक्तियाँ नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की विसंगतियों का एक सजीव एक्स-रे (X-ray) है। कविता के केंद्र में ‘रामलाल’ नाम का एक आम आदमी है, जो बेरोजगारी और पारिवारिक चिंताओं (संतान, घर की समस्या, खातों की चिंता) से तंग आकर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करता है। वह चौराहे की एक खाली जगह पर अपना ‘खोका’ (छोटी दुकान) लगा लेता है। लेकिन, जैसे ही एक गरीब अपने रोजगार के लिए सिर उठाता है, समाज के तथाकथित ठेकेदार और ‘शहर के नए चितेरे’ उसके दुश्मन बन जाते हैं।
व्यंग्य के इस आईने में कवि ने उन चार शक्तियों या नेताओं पर करारा प्रहार किया है, जो रामलाल जैसे आम इंसानों का शोषण करते हैं:
पहले नेता (विधायक): जो कभी ‘शूरा’ (अपराधी या बाहुबली) हुआ करते थे, आज खादी पहनकर विधायक बन बैठे हैं। ट्रस्ट बनाकर काले धन को सफेद कर रहे हैं और पापी से पुण्यात्मा बनने का ढोंग कर रहे हैं।
दूसरे नेता (पढ़े-लिखों के मसीहा): जो व्यापारियों के साथ मिलकर ‘ज्ञान दान’ यानी शिक्षा को धंधा बना चुके हैं। इन्होंने कोचिंग और कॉलेजों के नाम पर शिक्षा का बाजारीकरण कर शहर को बदनाम कर रखा है।
तीसरे व्यवस्थापक: जिन्होंने जनता के प्राकृतिक संसाधनों (कुओं) को बंद कर दिया, ताकि बोतल बंद पानी का व्यापार फल-फूल सके। बुनियादी जरूरतों का यह निजीकरण आम आदमी की कमर तोड़ रहा है।
चौथे नेता: जो स्वयं को ‘नर-नारायण’ यानी भगवान का रूप घोषित कर जनता की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं।
विडंबना देखिए कि ये चारों ताकतें, जो आपस में भले ही अलग हों, एक अकेले रामलाल (आम जनता) के पीछे हाथ धोकर पड़ गई हैं। जिस चौराहे की खाली जमीन पर रामलाल की नजर थी, उस पर ये चारों अपना हिस्सा जताते हैं। वे जनता को ‘जातिवाद का नारा’ देकर आपस में लड़ाते हैं और खुद मलाई की ‘बंदर बांट’ कर लेते हैं।
अधिकारी और सरकारें भी इन चारों के प्रभाव में हैं। देश के पढ़े-लिखे युवा भी इस ‘भेड़ चाल’ और नारेबाजी का हिस्सा बनकर रह गए हैं, जबकि उनका असली मुद्दा ‘रोजगार’ था। भोली-भाली जनता और उनका शांत धर्म-कर्म बस मूकदर्शक बना हुआ है।
कवि ने अंतिम पंक्तियों में एक शाश्वत और कड़वा सच लिखा है:”रीत सदा सै नीति सै ऊपर, है गरीब जो धरती सै नीचे।बन कैसे सकता अमीर है, किस्से और कहानी नीके…”
अर्थात, इस व्यवस्था में ‘रीत’ (परंपरागत शोषण) हमेशा ‘नीति’ (कानून) से ऊपर रहती है। गरीब हमेशा दबा कुचला रहता है और उसके अमीर बनने की बातें सिर्फ कहानियों और किस्सों में ही अच्छी लगती हैं, हकीकत के धरातल पर नहीं। यह आलेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जब तक आम आदमी इन चार बहरूपियों के जाल को नहीं समझेगा, तब तक ‘रामलाल’ का खोका सुरक्षित नहीं रहेगा।
आपका दिन शुभ हो!
शंकर देव तिवारी













