WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.48 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50 PM

भोले के प्रवक्ता की रपट: बटेश्वर का शाश्वत सत्

भोले के प्रवक्ता की रपट: बटेश्वर का शाश्वत सत्¤

आज के दौर में जब सोशल मीडिया की चकाचौंध और औपचारिकताओं के बीच लोग ‘राम-राम’ जैसी जमीनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, तब भोलेनाथ की पावन धरा बटेश्वर की आस्था का एक बिल्कुल साफ और अनूठा रंग देखने को मिलता है। यह एक ऐसी रपट है जो किसी राजनीतिक नफा-नुकसान की नहीं, बल्कि विशुद्ध जन-आस्था और जनहित की गवाही देती है। यहाँ के नायक केवल अपनों से सम्मानित होकर खुश होने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि वे जनता के दिलों में बसते हैं।

सुबह का नजारा देखिए; जब वे अपने आसन पर पधारते हैं, तो दृश्य किसी बड़े कथावाचक की भव्य सभा जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो यहाँ प्रतिदिन जन-आस्था का एक जीवंत शो चल रहा हो। कथा के प्रसंगों से लेकर बधाई के किसी भी मंगल पल तक, यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। भोले के इस दरबार और इनके जनसंपर्क के लिए कभी ‘मैनपावर’ या प्रायोजित भीड़ को आंकने की जरूरत ही महसूस नहीं होती; लोग स्वतः स्फूर्त खिंचे चले आते हैं।

समय का चक्र पीछे घुमाएं, तो अतीत की एक ऐतिहासिक तस्वीर जेहन में कौंध जाती है। वह दौर इनके पूज्य पिता जी का था, जब वे चुनावी यात्रा पर निकले थे। एक बार उनके विशेष वाहन का पहिया पंचर हो गया। वहाँ उनके इंतजार में खड़े लोगों की दीवानगी और निष्ठा ऐसी थी कि बिना किसी जैक के, लोगों ने अपने हाथों-हाथ गाड़ी को उठाकर पहिया बदल दिया। वह भी एक दौर था जब उनके सांस लेने भर की हलचल से ही गांव की चौपालों और स्कूलों में भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी। लडोरी (पारंपरिक लाठी) के सहारे टेक लेकर, घंटों तक जनसंपर्क करना और लोगों से सीधा संवाद साधना उनकी ऐसी अनूठी शैली थी जिसे इतिहास कभी नहीं भूल सकता।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो आजादी के बाद, सत्ता के अंग के रूप में पहली बार सदस्यता ग्रहण करने की वर्ष 1956 की वह ऐतिहासिक बैठक बटेश्वर में ही हुई थी। उस दौर में उनका चुनाव प्रचार केवल रात्रि के समय तक सीमित रहता था, जो धीरे-धीरे बदलते वक्त के साथ विशाल जनसभाओं में तब्दील होता चला गया। आज वही साख और विरासत उनकी आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही है।

वक्त बदला है, राजनीतिक दल बदले हैं, शासन की नीतियां और बैठने के आसन भी बदले हैं, लेकिन इस क्षेत्र का यह पारंपरिक आस्थाई तरीका आज भी जस का तस है। इस अटूट परंपरा को यह पूरा क्षेत्र ‘बटेश्वर महाराज’ का साक्षात आशीर्वाद मानकर सहर्ष स्वीकार करता है। आज भले ही सोशल मीडिया का आधुनिक युग आ गया हो, लेकिन यहाँ की संस्कृति आज भी उसी परंपरागत स्वागत-सत्कार, मान-सम्मान और जमीनी जुड़ाव तक ही केंद्रित है। ‘भोले के प्रवक्ता’ की यह रपट साफ कहती है कि यह सिलसिला तब तक ऐसे ही गरिमा के साथ जारी रहेगा, जब तक बटेश्वर महाराज की यह पावन सत्ता और उनका आशीर्वाद स्थापित है।

शंकर देव तिवारी

Leave a Comment