फाइनेंस कंपनियों की मनमानी वसूली पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती — रात के अंधेरे में वाहन उठाना कानून के मुताबिक नहीं
अगर आपने लोन पर कार, ट्रक, टैक्सी, टेम्पो या कोई अन्य कमर्शियल वाहन लिया है, तो सुप्रीम कोर्ट का 16 सितंबर 2026 का यह फैसला महत्वपूर्ण है।
मामला: Hari Dutta Sharma बनाम State of U.P. & Ors.
Civil Appeal No. 12950 of 2026
Citation: 2026 INSC 998
फैसले की तारीख: 16 सितंबर 2026
पीठ: न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिंहा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे।
1. मामला क्या था?
हरि दत्ता शर्मा ने Cholamandalam Investment and Finance Company Limited से एक Tata SFC 407 ट्रक के लिए कमर्शियल व्हीकल लोन लिया था।
कंपनी द्वारा स्वीकृत राशि लगभग ₹10.40 लाख थी, जिसमें से ₹9.36 लाख वितरित किए गए। बाद में ₹1.04 लाख का supplementary loan भी दिया गया।
किस्तों के भुगतान में चूक हुई। इससे पहले भी कंपनी ने वाहन वापस लिया था, लेकिन कुछ भुगतान के बाद वाहन छोड़ दिया गया था।
इसके बाद 9 अप्रैल 2023 की रात लगभग 1 बजे, शिकायतकर्ता के अनुसार, चार अज्ञात व्यक्तियों ने वाहन का steering lock तोड़ा और ट्रक लेकर चले गए।
उन्होंने पुलिस में e-FIR दर्ज कराई।
बाद में उन्हें पता चला कि कंपनी ने वाहन अपने कब्जे में लेकर 31 अगस्त 2023 को ₹4.50 लाख में बेच दिया था।
2. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्तीय संस्था को अपना बकाया वसूलने का अधिकार है, लेकिन वसूली का तरीका कानून के दायरे में होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि कर्ज की वसूली के लिए बैंक या फाइनेंस कंपनी बल, धमकी या तथाकथित “muscle power” का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
विशेष रूप से रात में वाहन का lock तोड़कर, बिना आवश्यक नोटिस और निर्धारित प्रक्रिया के वाहन अपने कब्जे में लेना कानूनसम्मत प्रक्रिया नहीं माना गया।
3. सात दिन की नोटिस का मुद्दा
इस मामले के loan agreement में वाहन कब्जे में लेने से पहले 7 दिन की notice का प्रावधान था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसा contractual provision होने के बावजूद कंपनी मनमाने तरीके से notice को समाप्त करके वाहन नहीं उठा सकती।
इसलिए इस फैसले को यह कहकर समझना सही नहीं होगा कि हर परिस्थिति में हर वाहन के लिए पूरे भारत में केवल 7 दिन की एक समान statutory notice अनिवार्य है।
लेकिन जहां loan agreement, RBI के fair-practice नियम और लागू कानून notice/process की मांग करते हैं, वहां financier को उनका पालन करना होगा।
4. संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मनमाने तरीके से वाहन कब्जे में लेने को Article 14 और Article 21 के संदर्भ में भी देखा।
खास तौर पर वाहन यदि व्यक्ति की आजीविका का साधन है, तो उसे कानून के बाहर जाकर अचानक छीन लेना गंभीर मामला हो सकता है।
5. सुप्रीम कोर्ट ने क्या राहत दी?
सुप्रीम कोर्ट ने:
✅ हाई कोर्ट का आदेश रद्द किया।
✅ दोनों loan accounts बंद करने का निर्देश दिया।
✅ वाहन बेचकर प्राप्त ₹4,50,000 वापस करने का निर्देश दिया, जिस पर बिक्री की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज देना था।
✅ मानसिक पीड़ा और आजीविका के नुकसान के लिए ₹10 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।
✅ ₹50,000 मुकदमे का खर्च भी देने का आदेश दिया।
6. RBI को भी महत्वपूर्ण निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने RBI की Fair Practices Guidelines के प्रभावी अनुपालन पर भी गंभीर टिप्पणी की और कहा कि केवल guidelines जारी करना पर्याप्त नहीं है; उनका वास्तविक पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।
कोर्ट ने RBI को NBFCs और बैंकों द्वारा इन दिशानिर्देशों के अनुपालन के लिए प्रभावी कदम उठाने को कहा।
7. वाहन मालिकों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि किसी बैंक/NBFC/फाइनेंस कंपनी ने आपका वाहन finance किया है और किस्तें बकाया हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी किसी भी समय बलपूर्वक वाहन उठा सकती है।
विशेष रूप से निम्न परिस्थितियां गंभीर कानूनी सवाल पैदा कर सकती हैं:
🔴 रात में अचानक वाहन उठाना
🔴 lock तोड़ना
🔴 बल या धमकी का इस्तेमाल करना
🔴 recovery agents द्वारा दबाव या मारपीट
🔴 contractual/RBI notice प्रक्रिया का पालन न करना
🔴 वाहन बेचने से पहले आवश्यक प्रक्रिया का पालन न करना
🔴 sale proceeds और outstanding account का उचित हिसाब न देना
8. अगर आपके साथ ऐसा हुआ है तो क्या करें?
1. तुरंत पुलिस में शिकायत करें
घटना की तारीख, समय, CCTV, वाहन नंबर और recovery agents की जानकारी सुरक्षित रखें।
2. सभी दस्तावेज सुरक्षित रखें
Loan agreement, repayment statement, notices, WhatsApp messages, call recordings, GPS/CCTV और vehicle seizure/sale documents संभालकर रखें।
3. Finance company को लिखित शिकायत दें
Repossession की तारीख, notice, agents की पहचान और vehicle sale की पूरी जानकारी लिखित में मांगें।
4. RBI की शिकायत व्यवस्था का उपयोग करें
यदि संबंधित संस्था RBI के Integrated Ombudsman Scheme के दायरे में आती है, तो उपलब्ध शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है।
5. जरूरत पड़ने पर न्यायालय/वकील की मदद लें
खासकर यदि वाहन आपकी आजीविका का मुख्य साधन है या वाहन बिना उचित प्रक्रिया के बेच दिया गया है।
⚖️ सबसे महत्वपूर्ण बात
कर्ज की किस्तें बकाया होना अलग बात है और कर्ज की वसूली के लिए कानून हाथ में लेना अलग बात है।
फाइनेंस कंपनी को अपना बकाया वसूलने का अधिकार हो सकता है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल कानून, RBI के लागू नियमों, loan agreement और उचित प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी मूल सिद्धांत को मजबूत करता है कि “Recovery का अधिकार है, लेकिन कानून के बाहर जाकर recovery करने का अधिकार नहीं है।”
📌 केस: Hari Dutta Sharma v. State of U.P. & Ors.
📌 2026 INSC 998
📌 निर्णय: 16 सितंबर 2026
📌 Civil Appeal No. 12950 of 2026
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: “Hari Dutta Sharma v. State of U.P. — Supreme Court judgment” (https://reference-url-citation.invalid/9)














