पुल तैयार, रास्ता गायब: चम्बल के ‘अधूरे विकास’ पर जन-आक्रोश का काव्यात्मक शंखनाद
अटेर नदगंवा।मप्र और यूपी की सीमा को जोड़ने वाले अटेर-उसेत घाट पर करोड़ों की लागत से चम्बल नदी का पुल तो खड़ा कर दिया गया, लेकिन उत्तर प्रदेश की सीमा में संपर्क मार्ग (एप्रोच रोड) न बनने से यह विकास आज भी अधूरा है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता धूल और पगडंडियों के सहारे सफर करने को मजबूर है। सरकारी फाइलों और राजस्व नक्शों में दर्ज सड़कें धरातल से पूरी तरह गायब हैं।
इसी क्षेत्रीय दर्द और प्रशासनिक अंधाधुंध रवैये को सुप्रसिद्ध कवि शंकर देव तिवारी ने अपनी तीखी कविता के जरिए उजागर किया है। वे लिखते हैं—
“स्थाई हो या अस्थाई राजश्व मेप में क्या दर्शाते… क्यों नहीं जुडी सड़क से, कहां गयीँ चक रोड़ें मेड हमारी।”
यह कविता केवल एक विलाप नहीं, बल्कि चम्बल-भदावर की सोई हुई जनता को जगाने का एक सशक्त माध्यम है। कवि नेताओं और ‘अंधे अधिकारियों’ को कटघरे में खड़ा करते हुए जनता से सीधा आह्वान करते हैं कि जो नेता सालों से केवल वादे कर रहे हैं, उन्हें अब घेरने का वक्त आ गया है।
कविता की सबसे मारक पंक्तियां चुनावी व्यवस्था पर सीधा प्रहार करती हैं:
“भूलो तुम मत अबके, वोट दियो अब सदकें”
साफ है कि भदावर की भोली जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है। यह शार्ट आलेख और तिवारी जी की कविता शासन-प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि यदि कागजी रास्तों को हकीकत की सड़कों में नहीं बदला गया, तो इस बार चम्बल की जनता “सड़क नहीं तो वोट नहीं” के नारे के साथ अपना फैसला सुनाएगी।














