पत्रकार कौन?
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम सवाल, अब पत्रकारिता को चाहिए पहचान, मर्यादा और जवाबदेही।
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बृज खंडेलवाल द्वारा
17 अक्टूबर 2026
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जब हर हाथ में मोबाइल हो, हर मोबाइल न्यूज़रूम बन जाए और हर सोशल मीडिया वाला खुद को पत्रकार बताने लगे, तो असली पत्रकार की पहचान कौन करेगा? क्या कैमरा उठाना ही काबिलियत है? क्या माइक पकड़कर चिल्लाने से पत्रकारिता आ जाती है? क्या किसी अफसर को धमकाते ही प्रेस की धौंस जमाई जा सकती है? और क्या पत्रकार होने का दावा करते ही खास सुरक्षा और सुविधाओं का पट्टा मिल जाना चाहिए?
सवाल तीखे हैं, मगर वक्त की जरूरत हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इसी पेचीदा मुद्दे पर गौर किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान तय करने की मुश्किलों की ओर इशारा किया।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकारी मान्यता न होने से उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।
दूसरी तरफ, सॉलिसिटर जनरल ने भी जायज सवाल उठाया। आज मोबाइल उठाइए, वीडियो बनाइए और खुद को पत्रकार घोषित कर दीजिए। न डिग्री, न तजुर्बा, न जवाबदेही। बस बन गए पत्रकार!
अदालत ने इस मसले पर विस्तार से विचार करने की जरूरत बताई है। अभी कोई अंतिम परिभाषा तय नहीं हुई है।
लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है। आखिर पत्रकारिता है क्या?
पत्रकारिता सिर्फ माइक, कैमरा और सोशल मीडिया पोस्ट का खेल नहीं है। इसके लिए जानकारी चाहिए, हुनर चाहिए और तथ्यों की जांच करने का सलीका चाहिए। ईमानदारी, समझ और जनता के प्रति जवाबदेही भी जरूरी हैं।
मोबाइल एक औजार है, योग्यता का प्रमाणपत्र नहीं। ऊंची आवाज हुनर की गारंटी नहीं। और प्रेस कार्ड कोई जादुई छड़ी नहीं, जिसे घुमाते ही सारे नियम खत्म हो जाएं।
अफसोस, आज पत्रकारिता का चेहरा कई जगह बिगड़ता नजर आता है। खबर पीछे छूट रही है, तमाशा आगे निकल रहा है। टीआरपी की दौड़ में सच कई बार दम तोड़ देता है।
जियोस्टार के उपाध्यक्ष उदय शंकर ने भी चिंता जताई है कि पत्रकारिता की पुरानी पहचान खत्म होती जा रही है। न्यूज़रूम अब खबरों की अहमियत से ज्यादा उनकी पहुंच और रेटिंग को तवज्जो देने लगे हैं।
पूर्व संपादक एन. राम भारतीय टीवी समाचार चैनलों की गुणवत्ता पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। राजदीप सरदेसाई ने भी पत्रकारिता के नैतिक पतन और उसके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए हैं।
बात कड़वी है, मगर सच से मुंह मोड़ने से क्या फायदा?
पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “जब खबर की जगह शोर बिकने लगे, सवाल की जगह गाली सुनाई दे और पड़ताल की जगह प्रोपेगेंडा परोसा जाए, तो पेशे की साख पर सवाल उठेंगे ही। पत्रकारिता कोई खुला मेला नहीं, जहां हर ऐरा-गैरा अपनी दुकान सजा ले। मगर यह किसी सरकार की जागीर भी नहीं, जहां सत्ता तय करे कि कौन बोलेगा और कौन चुप रहेगा।”
तो रास्ता क्या है?
भारत को पत्रकारों की पेशेवर पहचान के लिए एक पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था बनानी चाहिए। पत्रकारिता या जनसंचार की पढ़ाई, मान्यता प्राप्त संस्थान से डिग्री या डिप्लोमा, काम का अनुभव और किसी मीडिया संस्थान से जुड़ाव उपयोगी आधार हो सकते हैं।
लेकिन डिग्री को ही आखिरी कसौटी बनाना भी गलत होगा। कई अच्छे पत्रकार बिना औपचारिक डिग्री के इस पेशे में आए हैं। उन्होंने अपने काम से पहचान बनाई है।
प्रिंट मीडिया में लागू पंजीकरण व्यवस्था संस्थानों की पहचान में मदद कर सकती है। लेकिन पंजीकरण भी पत्रकारिता की गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। आखिर कागज पर दर्ज नाम और जमीन पर किए गए काम में फर्क होता है।
यूनेस्को का नजरिया इस बहस में अहम है। वह पत्रकारिता के लिए कोई कठोर शैक्षणिक योग्यता, अनिवार्य लाइसेंस या पत्रकारों की तय संख्या निर्धारित नहीं करता। उसका जोर इस बात पर है कि कौन जनहित में जानकारी जुटाता है, तथ्यों की पड़ताल करता है और जनता तक खबर पहुंचाता है।
इसलिए स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों, ब्लॉगरों और नागरिक पत्रकारों को एक झटके में खारिज नहीं किया जा सकता। उनका काम, अनुभव और आचरण भी मायने रखते हैं।
खासकर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई पत्रकार बेहद सीमित साधनों के बीच काम करते हैं। न बड़ा दफ्तर, न चमचमाती गाड़ी, न भारी-भरकम पहचान पत्र। फिर भी वे भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, सरकारी लापरवाही सामने लाते हैं और उन लोगों की आवाज बनते हैं जिन्हें अक्सर कोई सुनने वाला नहीं मिलता।
कई बार बड़े मीडिया संस्थान जिन खबरों से मुंह फेर लेते हैं, वही खबरें छोटे कस्बों के पत्रकार सामने लाते हैं।
ऐसे पत्रकारों को सिर्फ डिग्री या सरकारी मान्यता के अभाव में खारिज करना अन्याय होगा। असली कसौटी उनका काम, उनकी विश्वसनीयता और उनका आचरण होना चाहिए।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर किसी को खुली छूट दे दी जाए।
कर्नाटक के एक सीनियर मीडिया प्रशिक्षक बताते हैं, “कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में वसूली करते हैं। व्यापारियों को डराते हैं, अधिकारियों को धमकाते हैं और आम नागरिकों को ब्लैकमेल करते हैं। उनके लिए कैमरा सच दिखाने का जरिया नहीं, दबाव बनाने का हथियार है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। वे पत्रकारिता की इज्जत पर बट्टा लगाते हैं। चंद फर्जी पत्रकार पूरे पेशे को बदनाम कर देते हैं।”
यहां एक बात साफ होनी चाहिए। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं है। अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। सवाल पूछना पत्रकार का हक है, लेकिन किसी को डराकर अपना उल्लू सीधा करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
इसलिए समाधान सरकारी लाइसेंस बांटने या पत्रकारों पर राजनीतिक शिकंजा कसने में नहीं है। जरूरत ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था की है, जो पेशेवर पहचान, रिपोर्टिंग के अधिकार और विशेष सुविधाओं के बीच फर्क समझे। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया इसमें पहल करे। वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, अन्य पेशेवर लोग, कहीं न कहीं पंजीकृत होते हैं, प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है, तो फिर मीडिया के लोगों को ये व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती, कुछ तो पेशेवर मापदंड होने ही चाहिए।
आचार संहिता हो। शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। गलत काम साबित होने पर उचित कार्रवाई हो। लेकिन किसी पत्रकार की पहचान केवल इसलिए न छीनी जाए कि उसकी खबर सरकार या किसी ताकतवर व्यक्ति को पसंद नहीं आई।
आखिर लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की तारीफ में कसीदे पढ़ना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। जरूरत पड़ने पर असुविधाजनक सच सामने लाना है।
सरकार पत्रकार तय करने बैठेगी, तो कल खबरों की जगह फरमान छपेंगे।
बोलने का अधिकार हर नागरिक को है। जनहित में जानकारी जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की आजादी भी जरूरी है। लेकिन विशेष पेशेवर पहचान और उससे जुड़ी सुविधाओं के लिए विश्वसनीय काम, अनुभव और जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए।















