न्याय की कसौटी: न्यायिक नियुक्तियाँ और पारदर्शिता
शंकर देव तिवारी
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका संविधान की रक्षक है। किसी नागरिक के लिए अदालत सिर्फ इमारत नहीं, न्याय की उम्मीद होती है। लेकिन हाल के वर्षों में जजों की नियुक्ति की ‘कोलेजियम प्रणाली’ और सीधे वकीलों को जज बनाए जाने की प्रक्रिया ने जनमानस में गंभीर सवाल पैदा किए हैं। ये सवाल न्याय व्यवस्था के विरोध में नहीं, बल्कि उसे व्यावहारिक और पारदर्शी बनाने की मांग हैं।
व्यावहारिक धरातल पर आम नागरिक का यह सोचना स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति कभी निचली अदालतों की जमीनी हकीकत, मुकदमों के बोझ और तारीखों के दर्द से नहीं गुजरा, वह सीधे देश के सबसे ऊंचे न्यायिक पदों पर कैसे आसीन हो सकता है?
जब सीधे वकालत से आए न्यायाधीश वरिष्ठता के आधार पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) पद तक पहुँचते हैं, तो उनकी योग्यता पर नहीं, बल्कि उस चयन प्रक्रिया पर सवाल उठता है जो बंद कमरों में पूरी होती है। शंका उठना लाजिमी है कि क्या इस व्यवस्था में आम घरों से आने वाले प्रतिभावान वकीलों या निचली अदालतों के योग्य जजों को वह अवसर मिल पा रहा है? पारदर्शिता के अभाव में ‘भाई-भतीजावाद’ जैसी धारणाएं जन्म लेती हैं। जजों द्वारा ही जजों की नियुक्ति की यह गोपनीय व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत है।
नीतिगत दृष्टिकोण से लोकतंत्र का सिद्धांत ‘संतुलन और नियंत्रण’ है। कार्यपालिका और विधायिका जनता के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन भारत की कोलेजियम प्रणाली में न्यायपालिका खुद ही नियुक्तियाँ तय करती है। वर्ष 2014 में संसद द्वारा पारित ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ (NJAC) इसी सुधार की कोशिश थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए। जब तक जजों को चुनने की प्रक्रिया शीशे की तरह साफ नहीं होगी, तब तक लोगों के मन से आशंकाएं दूर नहीं होंगी। हमें ऐसी नीतिगत व्यवस्था की आवश्यकता है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा भी करे और सभी को बराबरी का मौका भी दे। पारदर्शिता से ही नागरिक का विश्वास मजबूत रहेगा।
न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए। यही नियम जजों की नियुक्ति पर भी लागू होता है। जब तक जजों को चुनने की प्रक्रिया शीशे की तरह साफ नहीं होगी, तब तक लोगों के मन से “अंधा कानून” का डर और आशंकाएं दूर नहीं होंगी।
हमें एक ऐसी संवेदनशील और नीतिगत व्यवस्था की आवश्यकता है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा भी करे और उसमें भारत के हर वर्ग, क्षेत्र और पृष्ठभूमि के मेधावी लोगों को बराबरी का मौका भी दे। जब नियुक्ति की प्रक्रिया में मानवीय पारदर्शिता और नीतिगत जवाबदेही का समावेश होगा, तभी न्यायपालिका के प्रति आम नागरिक का विश्वास अडिग और मजबूत रहेगा।
संसद बनाम न्यायपालिका का टकराव
यह जन-आशंका कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2014 में देश की संसद ने लगभग सर्वसम्मति से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून पारित किया था, ताकि नियुक्तियों में कार्यपालिका और जनता के प्रतिनिधियों की भी भूमिका हो। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए इसे असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया। तब से यह बहस और तेज हो गई है कि क्या न्यायपालिका खुद को किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक जवाबदेही से ऊपर रखना चाहती है?
माफ करें लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना या उसकी कमियों को रेखांकित करना नागरिक का अधिकार है। अन्यथा न लें प्लीज.














