दिया और बाती, सरकार के दो हाथी
नेता-कार्यकर्ताओं की भक्ति तो फीकी पड़ गई, असली ‘साष्टांग दंडवत जलवा’ तो अपने लखनऊ के अफ़सर-ए-आला दिखा रहे हैं!इनके जलवो में पिछले नो बरसों में बाढ़ ही आई है.
तस्वीर में गौर से देखिये—हमारे संजय प्रसाद (प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री) और अवनीश अवस्थी (सलाहकार) एकदम ‘दिया-बाती’ वाली जोड़ी बनाकर, ऐसी तन्मयता से दीया बार रहे हैं कि करवा चौथ पर पत्नियां भी पतिदेव के लिए इतनी एकाग्रता से थाली-दीया नहीं सजातीं है !
*जो बोल रहे है वो सौ टका सही है!*
यूपी की ब्यूरोक्रेसी के सबसे ऊंचे छप्पर पर सालों-साल यूं ही कब्जा थोड़ी रहता है! इसके लिए ऐसी ‘दीपोत्सव तंत्र’ में निपुण होना पड़ता है। जब शासन के इतने बड़े सूरमा इतनी शिद्दत से दीया बारने में लीन हों, तो समझ जाइये कि इनकी कुर्सी का तेल कभी खत्म नहीं होने वाला! और न कोई इतनी सिद्धत से सिद्धि चरण करेगा
प्रदेश के छोटे बड़े नेताजी तो बस देखते रह गए, असली ‘भक्ति-रस’ तो साहब लोग पी गए!पी रहे है!!
एक बड़ी अच्छी बात कहनी थी, याद आई है तो बोल दे रहे है, असली माफिया शायद आपको पता ही नहीं है, यही कुछ चंद् लोग है जो CM को ज्ञान दे रहे है कि माफिया खत्म हो गए है लेकिन यही है जो पूरा अफसरों और गुंडों का सिण्डिकेट चलाने लगे है। आज की तारीख में प्रदेश का कोई अफसर ऐसा नहीं होगा जो इन दो दिया बाती के पैर नहीं लाग रहा है क्योंकि बड़े देवता तक जाने के रास्ते पर ताला लगा कर यही रखे हुए है. इसी को कारागार का तन्हाई बैरक बोलते है….PS
बाबा सम्भल जाओ वरना ये तुमको चाट जायेगे और डकार नहीं लेगे ये वो है जो दूसरी सरकार में जायेगे और तुम्हारे सारे पोल की क़ीमत बसूल कर तुम्हे राजनीति के बाजार में बेच देंगे.
कलम को कहना होता है कहती है.कहेगी! अफ़सरी अपनी जगह है साहेब… पर ऐसी निष्ठा और साथ में दीया बारने का ये ‘ब्यूरोक्रेटिक सलीका’ हर किसी के बस का रोग नाहीं!
इस रोग को खत्म करने का सही समय आ गया हो तो दवा कर लो बाबा.















