*एलडीए विभाग, सरकारी दफ्तर या किसी रसूखदार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी?*
*एलडीए के अधिकारी बने बिल्डरों के पक्के कवच! जोन-6 का दफ्तर या अवैध निर्माण का अखाड़ा?*
लखनऊ विकास प्राधिकरण एलडीए का प्रवर्तन जोन-6 आज जनता के लिए सेवा का केंद्र कम और किसी अघोषित प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ज्यादा नजर आने लगा है। वजीरगंज, कैसरबाग और अमीनाबाद की घनी बस्तियों में अवैध निर्माणों की बाढ़ और जिम्मेदारों की चुप्पी इस बात की चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि यहां कानून नहीं, सिर्फ अधिकारियों की मर्जी चलती है।
जनता का हक या बाबुओं की जागीर? एलडीए प्रवर्तन जोन-6 के हुक्मरानों और अभियंताओं के सरकारी फोन जनता की सेवा के लिए हैं या केवल सजावट के लिए? हकीकत यह है कि आम जनता तो दूर, जनप्रतिनिधियों तक के फोन उठाने की जहमत नहीं उठाई जाती। क्या जनता अपनी समस्याएं इन महकमों के दरबार में न रखकर सीधे भगवान के भरोसे छोड़ दे?
फाइलों में जिन इमारतों पर ‘सीलिंग’ का ताला जड़ दिया जाता है, आखिर उन पर दोबारा निर्माण कैसे शुरू हो जाता है? क्या एलडीए के दफ्तर में बैठकर सील तोड़ने के परमिट बांटे जा रहे हैं? वजीरगंज क्षेत्र में मीणा ट्रांसपोर्ट के पास सीलिंग की गई बिल्डिंग पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण का कार्य चल रहा है, वहीं कैसरबाग में केशव भवन RSS कार्यालय के पीछे तो हद ही पार कर दी गई है। वहां कार्यालय की सुरक्षा को पूरी तरह से भंग करते हुए, वहीं सीलिंग तोड़कर और रास्ता बंद कर अवैध निर्माण को अंजाम दिया जा रहा है।
इन कारनामों के बाद भी बिजली विभाग और पुलिस विभाग की भूमिका पर बड़े और गंभीर सवाल खड़े होते हैं कि आखिर सील इमारतों में बिजली कनेक्शन कैसे चल रहे हैं और पुलिस की नाक के नीचे ये खेल कैसे हो रहा है? जब बड़े अधिकारी ही इस पर पूरी तरह मौन हैं, तो साफ है कि दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है। मुख्यमंत्री की सख्त हिदायतों और पारदर्शी शासन के दावों को जोन-6 के अधिकारियों ने ठेंगा दिखा रखा है। यहां की कार्यप्रणाली देखकर साफ लगता है कि सरकारी कुर्सी अब जनसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की मलाई काटने की निजी जागीर बन चुकी है।
सरकारी कुर्सियां जनता के खून-पसीने की कमाई से चलती हैं, किसी के बाप की बपौती नहीं। अगर जोन-6 के इन साहबों को अपना दफ्तर चलाना ही है, तो इसका नाम बदलकर प्राइवेट लिमिटेड रख लें, कम से कम जनता भ्रम में तो नहीं रहेगी!
अब जवाबदेही और विजिलेंस जांच की बारी, मीठी-मीठी लीपापोती और खोखले आश्वासनों का दौर अब बहुत हो चुका। जनता को अब जुमले नहीं, पारदर्शी कार्रवाई चाहिए।
यदि इन कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदारों में थोड़ी भी नैतिकता बची है, तो वे सीलिंग के रिकॉर्ड, मीणा ट्रांसपोर्ट और केशव भवन के पास चल रहे अवैध निर्माणों के मामलों में अपनी चुप्पी तोड़ें और कॉलिंग डिटेल्स सार्वजनिक करें। अगर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो सक्षम एजेंसी से इसकी विजिलेंस जांच कराकर इन सफेदपोशों को उनकी असली जगह दिखाई जानी चाहिए।
सीधा और आखिरी सवाल-आखिर इस अंधेरगर्दी का जवाब देगा कौन?














