मुझे जो स्थिति दिखाई दे रही है, वो बहुत चिंताजनक है। 10 अक्टूबर के बाद पूरे भारत में माहौल बिगाड़ने की तैयारी की जा रही है। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हो रही है, जिसमें आगजनी हो, तोड़फोड़ हो, मारपीट हो और आम जनता भी उसकी चपेट में आए। हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि सिविल वॉर जैसी स्थिति की आशंका पैदा हो जाए। यानी भारत की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसी बनाने की कोशिश की जा रही है।
अब ये मामला सिर्फ SIR, वोट चोरी या ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गया है। आप जरा सोचिए, क्या ये सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की लड़ाई है?
कॉकरोच जनता पार्टी के स्पोक्सपर्सन सौरभ दास खुद कह रहे हैं कि 10 अक्टूबर को चाहे हवाई जहाज से आइए, ट्रेन से आइए या बस से आइए, लेकिन प्रोटेस्ट में शामिल होना है। सवाल ये है कि आखिर इतनी बड़ी अपील किस मकसद से की जा रही है? प्रमाण क्या हैं? उनके पास क्या सबूत हैं?
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने फॉर्म-6 को लेकर जो कन्फ्यूजन है, उसे दूर करने की बात कही है। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया उस पर नोटिस जारी करेगा और अपना जवाब भी देगा। लेकिन सवाल ये है कि जब प्रक्रिया चल रही है, तो फिर माहौल को भड़काने की इतनी जल्दी क्यों है? ऐसा लग रहा है जैसे माचिस जलाना जरूरी है, क्योंकि माहौल को नेपाल और बांग्लादेश जैसा बनाने की कोशिश की जा रही है।
अब आपको बताती हूं कि ये मामला राहुल गांधी बनाम CJP कैसे हो गया।
राहुल गांधी नहीं चाहते कि इस पूरे प्रोटेस्ट को कोई दूसरा गुट हाईजैक कर ले। उन्हें शायद वो गलती दोबारा नहीं करनी, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के समय हुई थी। इसलिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा अभी से जंतर-मंतर पर तंबू लगाकर बैठ गए हैं। मतलब साफ है, वो नहीं चाहते कि कुछ छोटे-छोटे बच्चे आएं और अपने आकाओं को खुश करने के लिए पूरा आंदोलन अपने हाथ में ले लें।
अब असली सवाल ये है कि मामला FCRA का है या पंजाब चुनाव का? मैं सीधे-सीधे नहीं बोल रही हूं, लेकिन इशारा समझने वालों के लिए काफी है।
कहीं न कहीं बात अपने आकाओं को दोबारा खड़ा करने की है, उनका अस्तित्व बचाने की है। और सबसे दुख की बात ये है कि जो लोग प्यादे बनकर इस्तेमाल हो रहे हैं, शायद उन्हें खुद अंदाजा नहीं है कि जिस आग को वो भड़काने जा रहे हैं, उसका नुकसान सिर्फ सरकार या किसी पार्टी को नहीं होगा, बल्कि आम जनता को होगा।
जरा नेपाल और बांग्लादेश को देखिए। वहां भी शुरुआत एक छोटी सी चिंगारी से हुई थी और देखते ही देखते हालात तख्तापलट तक पहुंच गए। आज उन देशों की आर्थिक स्थिति पर कितना बड़ा असर पड़ा है, ये सबके सामने है। मेरा इशारा सिर्फ राजनीतिक स्थिति की तरफ नहीं है, मैं आर्थिक नुकसान की बात कर रही हूं। किसी देश को ऐसी स्थिति से बाहर निकलने में 10-15 साल भी लग सकते हैं।
और अब अगर यही परिस्थिति भारत में बनाने की कोशिश की जा रही है, तो हमें थोड़ा सतर्क होने की जरूरत है। किसी के बहकावे में आकर सड़क पर उतरने से पहले सोचिए कि इसका परिणाम क्या होगा। किसे फायदा मिलेगा और नुकसान किसका होगा?
क्योंकि अगर देश में आग लगती है, तो उसमें सिर्फ सरकार या नेता नहीं जलते, आम आदमी का घर, दुकान, रोजगार और भविष्य भी जलता है।
इसलिए थोड़ा सतर्क रहिए, चीजों को समझने की कोशिश कीजिए और सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय अपना दिमाग लगाइए।
जय हिंद।
भारत माता की जय।














