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विकास की कुल्हाड़ी और मां के नाम का पौधा — मोहित चौहान 

विकास की कुल्हाड़ी और मां के नाम का पौधा — मोहित चौहान

 

आधुनिक सभ्यता के विकास क्रम में विरोधाभासों की एक नई और चिंताजनक संस्कृति ने जन्म लिया है। एक तरफ भव्य मंचों से, भावुक कर देने वाले नारों के बीच ‘एक पेड़ मां के नाम’ लगाने का देशव्यापी आह्वान किया जाता है, तो दूसरी तरफ उसी व्यवस्था की फाइलों पर दस्तखत होते ही विकास और औद्योगिक परियोजनाओं की वेदी पर करोड़ों की संख्या में सदियों पुराने वनों को बेरहमी से बलि चढ़ा दिया जाता है। सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि बीते महज तीन वर्षों में ही देश भर में अलग-अलग परियोजनाओं के लिए 28 लाख से अधिक पेड़ों को काटने की मंजूरी दी गई है। यह विरोधाभास केवल नीतियों की ही विफलता नहीं है, बल्कि हमारी उस सामूहिक चेतना का संकट भी है जो प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु समझने लगी है।

 

मां के नाम पर लगाया गया एक नन्हा पौधा निसंदेह एक पवित्र भावना का प्रतीक हो सकता है, लेकिन क्या वह पौधा घने जंगल का विकल्प बन सकता है जिसने सदियों से पूरी पृथ्वी के जीवन को संभाला है? जब कोयला खदानों, बांधों, बिजली संयंत्रों और चौड़ी सड़कों के नाम पर हसदेव अरण्य या सिंगरौली जैसे देश के फेफड़ों को उजाड़ा जाता है, तब केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि उनके साथ एक पूरी जीवन प्रणाली ध्वस्त हो जाती है। अकेले हसदेव क्षेत्र और मध्य प्रदेश के धीरौली जैसे खनन ब्लॉकों में ही करीब 10 लाख से अधिक पेड़ों को काटने की तैयारी पर्यावरण के सीने पर एक गहरे घाव की तरह है।

 

इस अनियंत्रित कटान के कारण पर्यावरण को जो अपूरणीय क्षति हुई है, उसका सबसे पहला और मूक प्रहार हमारे वन्यजीवों पर होता है। जिन जंगलों को इंसानी लालच ने कंक्रीट के मरुस्थल में तब्दील कर दिया है, वे कभी लाखों बेजुबान जीवों के सुरक्षित आशियाने थे। अपने प्राकृतिक गलियारों के छिन जाने और भोजन-पानी के संकट के कारण आज हाथी, बाघ और तेंदुए इंसानी बस्तियों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। जिसे हम मानव- वन्यजीव संघर्ष’ का नाम देते हैं, वह वास्तव में बेजुबानों के घर पर हमारे अतिक्रमण का नतीजा है। जहां अंततः जीत आधुनिक हथियारों से लैस इंसान की ही होती है और हारती प्रकृति है।

 

बेघर होते वन्यजीवों की यह चीख अंततः इंसानी बस्तियों तक भी पहुंचती है। 22,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को विकास की भेंट चढ़ा देने का नतीजा आज ग्लोबल वार्मिंग, जानलेवा हीटवेव, बिन मौसम बरसात और तेजी से नीचे गिरते भूजल स्तर के रूप में हमारे सामने है। हवा में घुलता जहर इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति से की गई छेड़छाड़ का खामियाजा इंसान को अपनी सांसों की कीमत चुकाकर उठाना पड़ रहा है। इस पूरे संकट के मूल में सरकारों की वह प्रशासनिक ढील और नीतियों की कमजोरी है, जो औद्योगिक घरानों के दबावों में घुटने टेक देती है। कागजों पर ‘कैंपा’ जैसी योजनाएं बनाकर यह दावा किया जाता है कि काटे गए पेड़ों की भरपाई नए पौधे लगाकर कर दी जाएगी, लेकिन यह एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक धोखा है। एक समृद्ध, घना और विविधताओं से भरा प्राकृतिक जंगल कोई ऐसा उद्योग नहीं है जिसे एक जगह से दूसरी जगह दोबारा स्थापित किया जा सके। नए लगाए गए पौधे अक्सर देखरेख के अभाव में सूख जाते हैं, और यदि वे बच भी जाएं तो भी वे उस पारिस्थितिकी – तंत्र की बराबरी कभी नहीं कर सकते जो सदियों की प्राकृतिक प्रक्रिया से तैयार हुआ था।

 

संवेदनशील क्षेत्रों को खनन के लिए खोलना और पर्यावरण प्रभाव आकलन के नियमों को शिथिल करना यह दर्शाता है कि दीर्घकालिक जीवन के बजाय अल्पकालिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी जा रही है।

अब समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित करें। यदि हमारा विकास इंसानी फेफड़ों को काले धुएं से भरने और बेजुबान जीवों को बेघर करने की शर्त पर आ रहा है, तो इसे प्रगति नहीं बल्कि आत्मघाती कदम कहा जाना चाहिए। सरकारों को केवल प्रतीकात्मक अभियानों और नारों से आगे बढ़कर अपनी नीतियों में ईमानदारी लानी होगी। संवेदनशील और घने वनों को किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित करना होगा और तकनीकी रूप से ‘ट्री ट्रांसलोकेशन’ जैसे विकल्पों को अनिवार्य बनाना होगा ताकि पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें सुरक्षित स्थानांतरित किया जा सके। समाज और सरकार दोनों को यह समझना होगा कि कंक्रीट के आलीशान महलों में बैठकर साफ हवा और पानी की उम्मीद नहीं की जा सकती। यदि आज हमने कुल्हाड़ी की रफ्तार को नहीं रोका, तो मां के नाम पर लगाए जा रहे पौधे आने वाली पीढ़ियों के विनाश को नहीं ढक पाएंगे। विकास ऐसा होना चाहिए जो जीवन को सींचे, न कि उसकी जड़ों को ही काट दें।

 

( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। )

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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