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महुआ डाबर महोत्सव-2026 का समापन: ‘शौर्य दिवस’ पर गूंजी सशस्त्र सलामी, ‘विस्मृति से स्मृति’ तक पहुंचा इतिहास, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

महुआ डाबर महोत्सव-2026 का समापन: ‘शौर्य दिवस’ पर गूंजी सशस्त्र सलामी, ‘विस्मृति से स्मृति’ तक पहुंचा इतिहास

संग्रहालय में दिखीं 1857 की जली ईंटें, विरासत बचाने का लिया संकल्प

महुआ डाबर, बस्ती। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय “महुआ डाबर महोत्सव-2026” का समापन बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय कार्यक्रमों के साथ हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव का तीसरा एवं अंतिम दिन ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया गया।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीर पुरखों ने 6 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार के विरुद्ध निर्णायक विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसी घटना के प्रतिशोध में 3 जुलाई को अंग्रेजों ने पूरे गांव को जलाकर लगभग 5000 नागरिकों का नरसंहार किया और महुआ डाबर को ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर दिया था।

‘शौर्य दिवस’ के अवसर पर प्रातः 8 बजे क्रांति स्थल पर अमर क्रांतिवीरों की स्मृति में राजकीय सम्मान के साथ सशस्त्र सलामी दी गई। सलामी गारद दल में उपनिरीक्षक नन्हेलाल के नेतृत्व में मुख्य आरक्षी गुलाब चौधरी, संतोष सिंह, प्रभुनाथ चौरसिया, आरक्षी संजीत कुमार यादव, मनोज कुमार, पुष्कर यादव, राजन कुमार, मोहम्मद शकील और रणविजय शामिल रहे। इस दौरान बहादुर चौकी प्रभारी तेज प्रताप सिंह, उपनिरीक्षक विपिन कुमार भट्ट, आरक्षी सचिन यादव, आशीष कुमार राजपूत सहित भारी पुलिस बल मुस्तैद रहा।

समारोह में भाग लेने आए सैकड़ों लोगों ने महुआ डाबर संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय में रखी ‘ट्रेजरी ऑफ नॉलेज’ दिखाते हुए निदेशक डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि आज आप यहां ‘विस्मृति से स्मृति’ तक की यात्रा पर हैं। उत्खनन में मिली जली हुई ईंटें, सिक्के, औजार, 1857 के मुकदमों की कार्यवाही और दुर्लभ पुस्तकें दशकों की तपस्या का फल हैं। यह संग्रहालय 5000 शहीदों की स्मृति का जीवंत दस्तावेज है।

समापन सत्र में ‘विरासत संरक्षण संकल्प सभा’ का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आमजन के पास संरक्षित ब्रिटिशकालीन धरोहरों को महुआ डाबर संग्रहालय को सौंपकर इस ऐतिहासिक धरोहर को और समृद्ध बनाने की अपील की। साथ ही भावी पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के इस गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में महोत्सव को सफल बनाने में योगदान देने वाली उत्कृष्ट प्रतिभाओं, लोक कलाकारों, स्वयंसेवकों एवं सहयोगियों को अंगवस्त्र और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। महुआ डाबर की शहीद गाथा पर आधारित लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने माहौल को भावुक कर दिया।

अंत में दीप प्रज्वलन कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। राष्ट्रगान के साथ तीन दिवसीय ‘महुआ डाबर महोत्सव-2026’ का गरिमापूर्ण समापन हो गया।

इस ऐतिहासिक आयोजन में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, शोधार्थियों, युवाओं एवं समाजसेवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान दिया।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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