अद्भुत की अनदेखी: केवल पारंपरिक पदकों तक ही सीमित क्यों हो हमारा प्रोत्साहन?
शंकर देव तिवारी
दिल्ली।मेरठ के योग साधक विकास स्वामी और उनके दो बेटों—अनमोल व आदित्य स्वामी—द्वारा इटली के मिलान शहर में रचा गया इतिहास भारत के लिए एक असाधारण गौरव का क्षण है। हैंडस्टैंड (हाथों के बल) की अत्यंत कठिन मुद्रा में आकर अपने दांतों के सहारे 125 किलोग्राम का भारी-भरकम वजन 35.57 सेकंड तक हवा में थामे रखना सिर्फ शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं है। यह भारतीय योग साधना की चरम एकाग्रता, प्राणवायु के नियंत्रण और मानसिक दृढ़ता का एक ऐसा अभूतपूर्व नमूना है, जिसने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में देश का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा दिया। यह सफलता इसलिए भी चकित करने वाली है क्योंकि साल 2010 में एक भीषण सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद डॉक्टरों ने विकास स्वामी के कभी सामान्य न हो पाने की आशंका जताई थी। बिस्तर से उठकर विश्व रिकॉर्ड के मंच तक का उनका यह सफर अदम्य इच्छाशक्ति और योग की उपचारात्मक शक्ति का जीवंत प्रमाण है।
परंतु, इस ऐतिहासिक क्षण के उल्लास के पीछे एक ऐसा कड़वा सच भी छिपा है, जिस पर देश और प्रदेश की खेल व प्रशासनिक नीतियों को गंभीरता से आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। रिकॉर्ड्स और पुरस्कारों की तीन दर्जन (लगभग 29 से अधिक) फेहरिस्त रखने वाले इस स्वामी परिवार को इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि के बाद भी अब तक केंद्र या राज्य सरकार के स्तर से न तो कोई विशेष खेल प्रोत्साहन मिला है और न ही कोई आर्थिक सहयोग। यह उपेक्षा सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे देश में साहसिक विधाओं (Adventure Sports), कठिन योग साधनाओं और लीक से हटकर देश का नाम रोशन करने वाले कलाकारों की सामूहिक नियति बन चुकी है।
हमारा मौजूदा प्रशासनिक तंत्र अक्सर केवल उन्हीं खेलों और खिलाड़ियों पर धन और सम्मान की वर्षा करता है, जो ओलंपिक, कॉमनवेल्थ या स्थापित क्रिकेट लीग जैसे पारंपरिक खाकों में फिट बैठते हैं। निश्चित रूप से उन खिलाड़ियों का सम्मान जायज है, लेकिन क्या ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ जैसे वैश्विक मंच पर तिरंगा फहराने वाले इन साहसिक साधकों का हुनर किसी पदक से कमतर है? जब कोई वैश्विक मंच किसी भारतीय प्रतिभा की विशिष्टता को स्वीकार करता है, तो वह पूरे राष्ट्र की सामूहिक क्षमता का विज्ञापन होता है। ऐसे में नीतियों का लचीला न होना और इन विधाओं को ‘आधिकारिक खेल श्रेणी’ से बाहर रखकर प्रोत्साहन राशि से वंचित कर देना प्रतिभाओं के साथ अन्याय है।
योग को हम वैश्विक स्तर पर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में प्रचारित करते हैं। प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। लेकिन जब इसी योग साधना को एक कठिन और साहसिक पराकाष्ठा पर ले जाकर कोई वैश्विक रिकॉर्ड स्थापित करता है, तो तंत्र की चुप्पी निराश करती है। यदि सरकारें इन असाधारण साधकों को समय पर आर्थिक संबल और उचित सम्मान नहीं देंगी, तो संसाधनों के अभाव में ऐसी अनूठी कलाएं दम तोड़ देंगी और भावी पीढ़ी इस दिशा में आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाएगी।
समय आ गया है कि खेल और सांस्कृतिक मंत्रालयों की नीतियों के दायरे को विस्तृत किया जाए। साहसिक योग और विशिष्ट शारीरिक साधनाओं के लिए एक अलग प्रोत्साहन श्रेणी बनाई जानी चाहिए, ताकि विकास स्वामी जैसी प्रतिभाओं को अपनी कला के प्रदर्शन के लिए तंगी का सामना न करना पड़े। व्यवस्था को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश का गौरव बढ़ाने वाला हर पसीना कीमती है, चाहे वह खेल के मैदान में बहा हो या योग की किसी कठिन साधना की वेदी पर।














