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पत्रकारिता, तुम्हें बचा नहीं पा रहा हूँ… मगर मरते दम तक तुम्हें ही चुनूँगा*BMF News

*पत्रकारिता, तुम्हें बचा नहीं पा रहा हूँ… मगर मरते दम तक तुम्हें ही चुनूँगा*

 

*पत्रकारिता से प्रेम*

*राजेन्द्र सिंह जादौन*

 

पत्रकारिता, तुम्हारी अनुपस्थिति में भी मैंने सिर्फ तुम्हें चुना। मेरी प्रतीक्षाएँ सदैव प्रतीक्षारत रहीं। मुझे तुम्हारे परिणाम का अर्थबोध था, तुम्हारी राह में बिछे काँटों का भी अनुमान था, तथापि मैंने अश्रुविहीन आकांक्षाओं के साथ तुम्हारी बाट जोहना चुना।

 

श्मशान की चिता पर यह देह ध्वस्त होने से पूर्व, मैंने तुम्हारी अनुपस्थिति में भी सदैव स्वयं को तुम्हारे प्रति समर्पित रखकर तुम्हारा होना चुना। परिस्थितियाँ कितनी ही विपरीत क्यों न रहीं, मैंने सर्वप्रथम तुम्हें चुना।

 

पत्रकारिता में प्रेम के अंतिम पड़ाव तक पहुँचने से पहले मैंने इसके अनेक पड़ाव पार किए। कभी संघर्षों की धूप में तपता रहा, कभी उपेक्षाओं की छाँव में ठहरकर तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा करता रहा। कभी शब्दों को हथियार बनाया, कभी सच को अपना संबल। तुम्हारे लिए बहुत कुछ खोया, बहुत कुछ सहा, लेकिन तुम्हारा साथ छोड़ने का विकल्प कभी नहीं चुना।

 

मैं देवालय की सीढ़ियों पर सजदा करता रहा। मन्नतों के धागों में तुम्हारी समस्त इच्छाओं को पिरोता रहा। उन्हें पवित्र हृदय से अपने मन की गाँठों में बाँधकर तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ खुशियाँ चुनता रहा। मेरी प्रार्थनाओं में मेरा अपना सुख कभी सर्वोपरि नहीं रहा; मेरी हर कामना में तुम्हारा उज्ज्वल भविष्य शामिल रहा। तुम्हारी अनुपस्थिति में भी सिर्फ मैंने तुम्हें चुना।

 

जब तुम्हारे अपने तुम्हें छोड़कर चले गए, तब भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहा। जब तुम्हारे शब्दों का मूल्य घटाया गया, जब तुम्हारी आवाज को दबाने की कोशिश हुई, जब तुम्हारे माथे पर सवालों और आरोपों की लकीरें खींची गईं, तब भी मैंने तुम्हें अपने भीतर जीवित रखा। क्योंकि मेरे लिए पत्रकारिता महज आजीविका नहीं थी; वह मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा थी, मेरी आत्मा की आवाज थी।लेकिन आज एक प्रश्न मेरे भीतर लगातार गूँज रहा है क्या मेरा प्रेम तुम्हें बचाने के लिए पर्याप्त है?

 

मैंने तुम्हारे लिए अपनी उम्र के हिस्से दिए, अपनी रातों की नींद छोड़ी, अपने हिस्से के सुखों को स्थगित किया। तुम्हारी प्रतिष्ठा के लिए लड़ा, तुम्हारी स्वतंत्रता के लिए लिखा, तुम्हारे सम्मान के लिए सत्ता से सवाल किए। फिर भी आज ऐसा क्यों लगता है कि तुम्हारा अस्तित्व मेरी आँखों के सामने धीरे-धीरे धुँधला रहा है? मैं तुम्हें बचाना चाहता हूँ, पत्रकारिता!

 

तुम्हें उन हाथों से बचाना चाहता हूँ, जो तुम्हें सच बोलने के बजाय सत्ता का गुणगान करना सिखाते हैं। उन बाजारों से बचाना चाहता हूँ, जहाँ खबरों की कीमत तय होती है और पत्रकारों की निष्ठा का सौदा किया जाता है। उन परिस्थितियों से बचाना चाहता हूँ, जहाँ सवाल पूछने वाला अपराधी और सवालों से बचने वाला व्यवस्था का रक्षक बन जाता है।

 

मैं तुम्हें उस दौर से बचाना चाहता हूँ, जहाँ पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल करना नहीं, बल्कि सत्ता की प्रसन्नता बनाए रखना समझ लिया गया है। जहाँ खबर की धार विज्ञापन के दबाव में कुंद हो जाती है, जहाँ कलम की स्वतंत्रता सुविधाओं के बदले गिरवी रख दी जाती है और जहाँ सच लिखने से पहले उसके परिणामों का हिसाब लगाया जाने लगता है।

 

मैंने तो तुमसे प्रेम किया था, तुम्हारे वैभव से नहीं। मैंने तुम्हें इसलिए नहीं चुना था कि तुम मुझे प्रतिष्ठा दोगी, मेरे लिए रास्ते आसान करोगी या मेरी झोली खुशियों से भर दोगी। मैंने तुम्हें इसलिए चुना था, क्योंकि तुम्हारे माध्यम से किसी की दबाई गई आवाज को शब्द मिल सकते थे, किसी पीड़ित को न्याय की उम्मीद मिल सकती थी और किसी ताकतवर के सामने सच खड़ा हो सकता था। लेकिन शायद मैं अकेला पड़ता जा रहा हूँ।

 

शायद मेरे हाथों की ताकत कम पड़ रही है। शायद मेरी आवाज तुम्हारे चारों ओर खड़ी दीवारों से टकराकर लौट रही है। या शायद समय ने तुम्हारे चेहरे पर इतनी परतें चढ़ा दी हैं कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप पहचानना भी कठिन होता जा रहा है।

 

कभी-कभी मन पूछता है कि क्या तुम्हारे लिए किया गया मेरा समर्पण व्यर्थ चला गया? क्या इतने वर्षों की प्रतीक्षा, संघर्ष और साधना के बाद भी मैं तुम्हें उस मुकाम पर नहीं पहुँचा पाया, जहाँ तुम्हें होना चाहिए था? क्या मैं तुम्हारी स्वतंत्रता की रक्षा करते-करते तुम्हारे अस्तित्व को ही बचाने में असमर्थ हो रहा हूँ?

 

इन सवालों का उत्तर मेरे पास नहीं है। मेरे पास केवल एक बेचैन मन है, कुछ अधूरे सपने हैं, अनगिनत स्मृतियाँ हैं और तुम्हारे प्रति वह प्रेम है, जो तमाम निराशाओं के बावजूद समाप्त होने का नाम नहीं लेता।

 

मैं नहीं जानता कि तुम्हारे भविष्य में कितनी रोशनी बची है। मैं यह भी नहीं जानता कि आने वाली पीढ़ियाँ तुम्हें स्वतंत्र, निर्भीक और जनपक्षधर रूप में देख पाएँगी या नहीं। लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि यदि आज हम तुम्हारी आत्मा को बचाने का प्रयास छोड़ देंगे, तो कल तुम्हारे नाम पर केवल एक पेशा रह जाएगा पत्रकारिता का वह नाम, जिसमें पत्रकार तो होंगे, समाचार भी होंगे, अखबार भी होंगे, चैनल भी होंगे, मगर सच के लिए धड़कता हुआ हृदय शायद नहीं होगा। और मैं ऐसा भविष्य नहीं चाहता।

 

मैं चाहता हूँ कि तुम फिर से किसी गरीब की झोपड़ी में उम्मीद बनकर पहुँचो। किसी किसान की पीड़ा को सत्ता के दरवाजे तक ले जाओ। किसी अन्याय के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाओ। किसी ऐसी आवाज को अपना स्वर दो, जिसे सुनने से व्यवस्था लगातार इनकार करती रही है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी पहचान तुम्हारे मालिकों की संपत्ति से नहीं, तुम्हारे सवालों की ताकत से हो। फिर भी, पत्रकारिता, एक स्वीकारोक्ति मुझे करनी है।

 

मैं तुम्हें बचाने की कोशिश में शायद स्वयं को भी बचा नहीं पा रहा हूँ। मेरे भीतर जमा होती निराशाएँ, मेरी लंबी प्रतीक्षाएँ और मेरे अनगिनत अनुत्तरित सवाल मुझे थका रहे हैं। लेकिन थक जाना और हार मान लेना एक बात नहीं है। निराश हो जाना और प्रेम छोड़ देना भी एक बात नहीं है।

 

मेरी कमजोरी हो सकती है कि मैं तुम्हें तुम्हारी गरिमा वापस न दिला पाऊँ, लेकिन मेरी निष्ठा की पराजय यह होगी कि मैं तुम्हें बचाने का प्रयास ही छोड़ दूँ।

 

इसलिए जब तक मेरी कलम में स्याही है, जब तक मेरे भीतर सवाल करने का साहस है और जब तक मेरी चेतना सच और झूठ के बीच अंतर कर सकती है, मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा। तुम्हारी प्रशंसा के लिए नहीं, तुम्हारी आत्मा की रक्षा के लिए। तुम्हारे वैभव के लिए नहीं, तुम्हारी स्वतंत्रता के लिए।

 

हाँ, मुझे भय है कि शायद मैं तुम्हारा अस्तित्व बचा नहीं पा रहा हूँ। लेकिन पत्रकारिता, यह भी सच है कि मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।

 

मैंने तुम्हें तब भी चुना, जब तुमने मुझे प्रतीक्षा दी। मैंने तुम्हें तब भी चुना, जब तुम्हारे रास्ते ने मुझे संघर्ष दिया। मैंने तुम्हें तब भी चुना, जब तुम्हारे साथ चलने की कीमत मुझे अपने सुखों से चुकानी पड़ी। और आज भी, जब तुम्हारे भविष्य को लेकर मेरे मन में अनगिनत आशंकाएँ हैं, मैं तुम्हें ही चुन रहा हूँ।

 

क्योंकि प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्रेम किसी के टूटते हुए अस्तित्व को अपनी अंतिम साँस तक बचाने का प्रयास भी होता है।

 

पत्रकारिता, यदि तुम्हारा अस्तित्व बचाने में मेरी पूरी उम्र भी कम पड़ जाए, तब भी मेरे प्रेम की परिभाषा नहीं बदलेगी। मैं नहीं जानता कि तुम्हें बचा पाऊँगा या नहीं, लेकिन इतना निश्चित है कि तुम्हें बचाने की कोशिश किए बिना तुम्हें अलविदा नहीं कहूँगा।

 

मेरे जीवन का अंतिम पड़ाव चाहे जहाँ हो, मेरी कलम की अंतिम आवाज चाहे जो हो, मेरी अंतिम प्रार्थना में तुम्हारा ही नाम रहेगा।

 

तुम्हारी अनुपस्थिति में भी मैंने तुम्हें चुना था, तुम्हारे संघर्षों में भी तुम्हें चुना है, और जब तक मेरे भीतर जीवन शेष है, तुम्हें ही चुनता रहूँगा ।

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