*पुलिस ने रोका तो चोर दरवाजे से शुरू हुआ काम, जनता करे तो क्या करे?*
*इतिहास झांकता रह गया खिड़की से, पीछे खड़ी हो गई दुकानों की दीवारें,*
*संवाददाता मोहम्मद सैफ साबरी*
लखनऊ की ऐतिहासिक धरोहरों और नियमों की नुमाइश का यह नज़ारा वाकई अजब है। एक तरफ उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री जी की सख्त हिदायतें और सूबे में अवैध कब्जों पर बुलडोजर की गूँज है, तो दूसरी तरफ राजधानी लखनऊ में चुनिंदा लोगों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे कानून को ठेंगा दिखाकर रातों-रात महलों जैसी इमारतें खड़ी करने में जुटे हैं।
माज़रा हजरतगंज के सिब्तैनाबाद मकबरे के पीछे कार बाजार रोड पर नोवेल्टी सिनेमा की पार्किंग के सामने जहां एक ओर इतिहास की अमूल्य धरोहरें अपनी सांसें गिन रही हैं, वहीं दूसरी ओर उसकी आड़ में मार्केट और दुकानों का धड़ल्ले से निर्माण किया जा रहा है। हालत यह है कि जिस ऐतिहासिक धरोहर को शहर की शान और पुरानी तहजीब का प्रतीक माना जाता है, उसे ही चारों तरफ से ढंकने और छुपाने का नायाब खेल खेला जा रहा है। पीछे का पुराना रास्ता और आने-जाने के रास्ते भी बंद कर दिए गए हैं, ताकि लोगों की नजरें इस अवैध खेल पर न पड़ सकें और अंदर-अंदर व्यावसायिक दुकानें आबाद हो सकें।
हैरानी की बात तो यह है कि इस गंभीर मामले पर लखनऊ विकास प्राधिकरण की तरफ से नोटिस भी जारी हो चुकी है और सिब्तैनाबाद ट्रस्ट से जुड़ा विवाद भी कानूनी-कारवाई की देहरी तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद निर्माणकर्ताओं के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। पिछले दिनों स्थानीय पुलिस ने पहुंचकर काम एक बार फिर बंद कराया था, लेकिन पुलिस के कदम मुड़ते ही चोरी-छिपे और तेज रफ्तार से निर्माण का यह सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। स्थानीय लोग लगातार विभागों के चक्कर काट रहे हैं, शिकायतें दर्ज करवा रहे हैं, मगर फाइलों के पेट से बाहर आकर जमीनी हकीकत पर कार्रवाई की रफ्तार सुस्त ही बनी हुई है।
अगल-बगल बनी दुकानों ने तो पहले ही इस ऐतिहासिक धरोहर के वजूद को कोहरे की तरह धुंधला कर दिया है, और अब इस नए निर्माण के जरिए उस पर आखिरी पर्दा डालने की पूरी तैयारी है। यदि स्थानीय प्रशासन, एलडीए और नगर निगम ने अब भी आँखों से पट्टी नहीं खोली, तो वह दिन दूर नहीं जब रातों-रात कागजों और नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर यह इमारत खड़ी हो जाएगी और शहर की एक और ऐतिहासिक निशानी कंक्रीट के जंगल में हमेशा के लिए दफन होकर रह जाएगी।
क्या स्थानीय प्रशासन इस अवैध निर्माण पर कोई ठोस और स्थाई ब्रेक लगाने की हिम्मत जुटा पाएगा या फिर सब कुछ यूं ही फाइलों और नोटिसों के मकड़जाल में उलझा रहेगा?















