WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.48 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50 PM

विकास की प्राथमिकताएं और आगरा की जमीनी जरूरतें शंकर देवी तिवारी 

विकास की प्राथमिकताएं और आगरा की जमीनी जरूरतें

शंकर देवी तिवारी

 

आगरा में बहुप्रतीक्षित मेट्रो सेवा का शुभारंभ हो चुका है। आधुनिक परिवहन के लिहाज से यह एक बड़ा मील का पत्थर है। ताज नगरी की सड़कों पर दौड़ती मेट्रो बदलते भारत की चमचमाती तस्वीर पेश करती है। लेकिन इस ऐतिहासिक शुरुआत के साथ ही शहर में एक नई बहस छिड़ गई है। ताज्जुब यह है कि इस नई विधा का जिस गर्मजोशी से स्वागत होना चाहिए था, उसकी जगह इसके औचित्य और भविष्य की प्राथमिकताओं की तीखी समीक्षा हो रही है। आम जनता और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग मेट्रो को आगरा के वास्तविक विकास की राह में एक अवरोध के रूप में देखने लगा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या अरबों रुपये की लागत से बनी मेट्रो वाकई इस समय आगरा की सबसे बड़ी जरूरत थी?यह बहस बेबुनियाद नहीं है। किसी भी शहर का विकास उसकी बुनियादी समस्याओं के समाधान और नागरिकों की जीवन स्तर सुधारने वाली प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। आगरा पिछले चालीस साल से कुछ ऐसी बुनियादी मांगों के लिए संघर्ष कर रहा है, जो सीधे तौर पर यहां की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और युवाओं के भविष्य से जुड़ी हैं। मेट्रो की चकाचौंध के बीच इन चार प्रमुख मांगों की अनदेखी ने जनमानस में असंतोष पैदा कर दिया है।सबसे पहली और गंभीर समस्या पानी और पर्यावरण की है। आगरा के लिए ‘यमुना बैराज’ (वेराज) की मांग दशकों पुरानी है। हर साल गर्मी में यमुना सूख जाती है, जिससे न केवल पेयजल का संकट गहराता है बल्कि ताजमहल की नींव की सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं। एक बैराज बनने से पानी का स्तर सुधरता और पर्यटन को नया जीवन मिलता। लेकिन सरकार ने बैराज को ठंडे बस्ते में डालकर मेट्रो को तरजीह दी, जिससे जनता में यह संदेश गया कि उसकी बुनियादी प्यास से ज्यादा महत्व दिखावे के बुनियादी ढांचे को दिया जा रहा है।दूसरी बड़ी मांग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए आगरा में ‘हाईकोर्ट बेंच’ की स्थापना की है। न्याय के लिए यहां के वादियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर इलाहाबाद जाना पड़ता है। चालीस साल से चल रहे इस आंदोलन को दरकिनार करना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक और न्यायिक सुगमता नीति नियंताओं के एजेंडे में नीचे है। इसके साथ ही, एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के ‘हवाई अड्डे’ (इंटरनेशनल एयरपोर्ट) की कमी आगरा के पर्यटन उद्योग को पंख नहीं लगने दे रही है। ताज़महल होने के बावजूद सैलानी दिल्ली उतरते हैं और आगरा सिर्फ एक दिन के लिए आते हैं। अगर यहां पूर्ण विकसित हवाई अड्डा होता, तो होटल, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यापार को भारी मुनाफा होता।एक और दुखद पहलू युवाओं और खेल संस्कृति की उपेक्षा का है। आगरा के पास आज भी एक अदद आधुनिक ‘खेल स्टेडियम’ नहीं है। जहाँ छोटे शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम बन रहे हैं, वहीं आगरा के युवा प्रतिभाएं बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रही हैं। स्टेडियम की मांग भी पिछले चार दशकों से धूल फांक रही है।मेट्रो निश्चित रूप से एक बेहतरीन परिवहन साधन है, लेकिन इसकी उपयोगिता तब सिद्ध होती है जब शहर की बुनियादी आर्थिक और सामाजिक संरचना मजबूत हो। जब तक युवाओं को रोजगार देने के लिए उद्योग नहीं होंगे, पर्यटकों को रोकने के लिए हवाई अड्डा नहीं होगा और जनता के पास पीने को साफ पानी नहीं होगा, तब तक मेट्रो केवल एक सफेद हाथी बनकर रह जाएगी।समय आ गया है कि सरकारें केवल बड़े बजट की परियोजनाओं की चकाचौंध से बाहर निकलें। विकास का पैमाना वह होना चाहिए जो जनता की चालीस साल पुरानी टीस को मिटा सके। मेट्रो का स्वागत तभी सार्थक होगा जब उसके साथ-साथ बैराज, हाईकोर्ट बेंच, हवाई अड्डा और स्टेडियम जैसी जमीनी जरूरतें भी पूरी की जाएं। अन्यथा, यह आधुनिकता आगरा के वास्तविक विकास को अपनी जद में ले लेगी।

Leave a Comment