देवरिया में राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल: गाटा संख्या 77, मौजा तेनुआ में 20.03.2024 की कथित कब्जा कार्यवाही की निष्पक्ष जांच की मांग तेज
भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने उठाई नार्को टेस्ट और स्वतंत्र जांच की मांग
देवरिया में अधिकारियों की खुली पोल
भू-माफियाओं का साम्राज्य हो रहा है देवरिया में स्थापित, जिला देवरिया बनी भूमाफियाओं की राजधानी।








भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार ने भी इस भ्रष्टाचार के पूरे खुलासे की मांग उठाई हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण में शामिल सभी अधिकारियों का नार्को टेस्ट कराया जाए।
वाराणसी / देवरिया। उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया को लेकर एक बेहद गंभीर शिकायत सामने आई है, जिसने पूरे राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ग्राम जिगना मिश्र, पोस्ट भटनी, थाना भटनी, तहसील सलेमपुर, जिला देवरिया का है।
प्रार्थी कृष्ण माधव मिश्रा ने आरोप लगाया है कि मौजा तेनुआ, गाटा संख्या 77 पर दिनांक 20.03.2024 को कराई गई कथित कब्जा कार्रवाई पूरी तरह से अभिलेखीय और विधिक आधार से परे है। इस प्रकरण में पुराना संदर्भ 40019024002577 और नया IGRS संदर्भ 15190260164302 दर्ज है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि देवरिया में भूमाफियाओं का साम्राज्य स्थापित हो रहा है और प्रशासनिक मिलीभगत से आम किसानों की जमीनों पर कब्जा कराया जा रहा है। इस मामले को लेकर भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार ने भी पूरे प्रकरण के खुलासे और इसमें शामिल अधिकारियों के नार्को टेस्ट की मांग उठाई है।
पेज 1: विवाद का मूल – गाटा संख्या 77 पर सवालों के घेरे में कार्रवाई
प्रार्थी के अनुसार प्रस्तुत की गई सरकारी आख्या में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया गया है। सबसे बड़ा और मुख्य सवाल यही है –
जब संबंधित फर्जी बैनामा, नामांतरण आदेश, और सीमांकन आदेश में गाटा संख्या 77 का स्पष्ट उल्लेख या आधार ही नहीं है, तो 20.03.2024 को गाटा संख्या 77 के साथ सभी फर्जी आदेशों के गाटा संख्याओं पर 1/2 भाग पर कब्जा किस आदेश, किस अभिलेख और किस विधिक आधार पर कराया गया?
शिकायत में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इस पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध है, जिसे ई-मेल के माध्यम से प्रशासन को भेजा भी गया है। मांग है कि उस वीडियो साक्ष्य का परीक्षण कर मौके की वास्तविक स्थिति, वहां उपस्थित अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और कार्रवाई के आधार का अभिलेखीय मिलान कराया जाए।
प्रार्थी द्वारा जांच के लिए 10 मुख्य प्रश्न उठाए गए हैं जो इस प्रकार हैं:
1. गाटा संख्या 77 को पूर्व आख्या में क्यों दर्शाया गया, जबकि मूल दस्तावेजों में उसका आधार नहीं है?
2. 20.03.2024 की कार्रवाई किस लिखित आदेश के आधार पर हुई? वह आदेश कहाँ है?
3. एसडीएम द्वारा गठित टीम का गठन आदेश कहाँ है?
4. मौके पर उपस्थित राजस्व अधिकारियों/कर्मचारियों के नाम क्या हैं?
5. थाना भटनी से कौन-कौन पुलिसकर्मी मौके पर उपस्थित थे? उनकी ड्यूटी का रिकॉर्ड क्या है?
6. पंचनामा, कब्जा पत्र, मौके की रिपोर्ट एवं सीमांकन रिपोर्ट कहाँ है?
7. यदि बैनामा/नामांतरण/सीमांकन आदेश में गाटा 77 का आधार नहीं है, तो उक्त भूमि पर कब्जे का अभिलेखीय आधार क्या था?
8. पूर्व आख्या और वर्तमान/संशोधित विवरण में अंतर क्यों है?
9. उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग का सरकारी अभिलेखों से मिलान क्यों नहीं कराया गया?
10. यदि पूर्व आख्या अपूर्ण/तथ्यात्मक रूप से गलत पाई जाती है तो संशोधित, तथ्यपरक एवं अभिलेख-आधारित आख्या क्यों न ली जाए?
उत्तर प्रदेश जनसुनवाई-समाधान IGRS व्यवस्था में यह प्रावधान है कि यदि शिकायतकर्ता निस्तारण से असंतुष्ट है तो फीडबैक के बाद शिकायत को पुनः परीक्षण के लिए भेजा जाए और आवश्यकता होने पर उच्च स्तर पर पुनरीक्षण किया जाए।
पेज 2: विधिक पहलू – क्या SDM को कब्जा कराने का अधिकार है?
प्रार्थी ने अपने शिकायती पत्र में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण आदेशों का भी हवाला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश:
Ram Sumer Puri Mahant Vs State of U.P. और Amresh Tiwari Vs Lalta Prasad में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है – जब संपत्ति के कब्जे / टाइटल का मामला सिविल कोर्ट में लंबित हो, तो उसी संपत्ति पर धारा 145 CrPC अब BNSS की धारा 164/165 के तहत समानांतर कार्यवाही शुरू करना बिल्कुल अवैध है। SDM को कार्यवाही Drop करनी होगी। 1985, 2000
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी वर्ष 2024-25 में अपने आदेशों में दोहराया है कि अगर कोई पक्ष वास्तविक कब्जे में है तो BNSS 164/165 से उसे बेदखल नहीं किया जा सकता, बेदखली केवल सिविल कोर्ट के आदेश से होगी।
किस आधार पर यह कार्रवाई विधि विरुद्ध बताई जा रही है:
1. Transfer of Property Act की धारा 52 – Lis Pendens का सिद्धांत: केस लंबित रहते हुए जमीन का ट्रांसफर या कब्जा बदलना गैर-कानूनी माना जाता है, अगर वो दूसरे पक्ष के हित को प्रभावित करे।
2. Order 39 Rule 1,2 CPC: सिविल कोर्ट में कब्जे का प्रश्न तय होना है तो राजस्व न्यायालय को यथास्थिति बनाए रखनी चाहिए।
3. UP Revenue Code 2006 की धारा 24/34: जब सिविल कोर्ट पहले से उसी जमीन पर सुनवाई कर रहा हो तो SDM को टाइटल तय करने का अधिकार नहीं।
अर्थात केवल स्टे नहीं होने का फायदा उठाकर SDM या राजस्व टीम जबरन कब्जा नहीं करा सकती। केस का लंबित होना ही SDM की कार्रवाई पर रोक का आधार है।
वहीं नए कानून BNS 2023 के तहत भी शिकायतकर्ता ने धाराओं का उल्लेख किया है – धारा 329 BNS आपराधिक अतिचार, धारा 324 BNS रिष्टि, धारा 351 BNS आपराधिक धमकी, धारा 308 BNS जबरन वसूली, और यदि लोक सेवक द्वारा मिलीभगत से कार्य किया गया हो तो धारा 199 BNS लोक सेवक द्वारा विधि के विरुद्ध कार्य करना।
पेज 3: मांग – निष्पक्ष स्वतंत्र अधिकारी से जांच और दंडात्मक कार्रवाई
प्रार्थी कृष्ण माधव मिश्रा ने मुख्यमंत्री कार्यालय @CMOfficeUP, @UPGovt, @UPPolice, @DmDeoria, @JansunwaiUP से स्पष्ट मांग की है कि –
गाटा संख्या 77 सहित वर्तमान आख्या के अनुसार समस्त गाटा संख्या पर 20.03.2024 को कराए गए कथित अवैध कब्जे की निष्पक्ष, स्वतंत्र अधिकारी से जांच कराई जाए।
उनका आरोप है कि अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध कार्यवाही में लिप्त समस्त अधिकारी – एसडीएम सलेमपुर, उनके द्वारा गठित टीम जिसमें तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल, चपरासी शामिल हैं, जिन्होंने विपक्षी सुनील कुमार सहित अन्य लोगों को लाभ पहुंचाने का कार्य किया है, उनके खिलाफ विधि विरुद्ध कार्यवाही करने के कारण आवश्यक दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक बिंदु:
शिकायतकर्ता की मांग है कि केवल औपचारिक आख्या के आधार पर प्रकरण बंद न किया जाए, बल्कि निम्न बिंदुओं पर जांच हो:
– मूल राजस्व अभिलेखों का सत्यापन
– बैनामा/नामांतरण/सीमांकन आदेश का आपसी मिलान
– 20.03.2024 की कार्रवाई का आदेश एवं रिकॉर्ड सत्यापन
– पुलिस ड्यूटी/मौके पर उपस्थिति का सत्यापन
– पंचनामा/कब्जा पत्र/नक्शा/मौके की रिपोर्ट की जांच
– उपलब्ध वीडियो साक्ष्य का परीक्षण
– पूर्व एवं वर्तमान आख्या के अंतर की जांच
– जिम्मेदारी का निर्धारण, यदि आख्या तथ्यात्मक रूप से अपूर्ण पाई जाए
अंत में प्रार्थी का मुख्य सवाल वही है जो पूरी जांच की नींव है – जब तक इस प्रश्न का दस्तावेजी उत्तर नहीं मिलता कि मूल दस्तावेजों में गाटा संख्या 77 का आधार स्पष्ट नहीं होने के बावजूद 20.03.2024 को उक्त भूमि पर कब्जा किस आदेश और किस अभिलेखीय/विधिक आधार पर कराया गया, तब तक शिकायत के वास्तविक तथ्यों का निष्पक्ष सत्यापन आवश्यक है।
यह प्रकरण अब केवल एक गाटा संख्या का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश में IGRS, राजस्व विभाग की पारदर्शिता, जवाबदेही और जनशिकायत निस्तारण प्रणाली की परीक्षा बन गया है।














