उत्सवों का राजनीतिक भूगोल और सामाजिक चेतना
शंकर देव तिवारी
देश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में पहचान रखने वाले ताजनगरी आगरा में जब ‘राम बरात’ और ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती’ के आयोजनों की सुगबुगाहट शुरू होती है, तो यह केवल धार्मिक या सामाजिक उत्सवों की तैयारी भर नहीं होती। जैसे ही इन महा-आयोजनों के मुख्य पड़ावों—’जनकपुरी’ और ‘भीम नगरी’—के लिए स्थलों का चयन होता है, वैसे ही शहर के सियासी पारे में एक अभूतपूर्व और सकारात्मक हलचल देखने को मिलती है। यह हलचल केवल चुनावी गुणा-भाग या वोट बैंक की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्सव और विकास के एक ऐसे अनूठे अंतर्संबंध को रेखांकित करती है, जो देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।आगरा के राजनीतिक परिदृश्य में इन दोनों आयोजनों के स्थल तय होने के बाद जो तत्परता दिखाई देती है, उसका सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष लाभ यहाँ के बुनियादी ढांचे को मिलता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अक्सर जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, लेकिन जनकपुरी या भीम नगरी घोषित होते ही उस विशेष क्षेत्र की रूपरेखा रातों-रात बदल जाती है। सड़कों का चौड़ीकरण, आधुनिक विद्युत व्यवस्था, जलापूर्ति में सुधार और प्रशासनिक मुस्तैदी जैसी बुनियादी जरूरतें प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाती हैं। जनप्रतिनिधियों (विधायक, सांसद और पार्षदों) के बीच अपनी विकास निधि को इन क्षेत्रों में लगाने की जो होड़ मचती है, वह यह साबित करती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो विकास की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। यह ‘उत्सव के बहाने विकास’ की एक ऐसी सकारात्मक राजनीति है, जिसमें जीत अंततः आम जनता की ही होती है।इस प्रशासनिक कायाकल्प से भी बड़ा पहलू सामाजिक समरसता का है। आगरा का सामाजिक ताना-बाना पारंपरिक और प्रगतिशील दोनों ही धाराओं को एक साथ समेटे हुए है। राम बरात जहां सांस्कृतिक विरासत और सनातनी मूल्यों का उत्सव है, वहीं भीम नगरी दलित चेतना, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की हुंकार है। आयोजन स्थलों की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की सक्रियता यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी विचारधारा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विभिन्न वर्गों के मंचों पर नेताओं की मौजूदगी और दोनों ही आयोजनों में सभी समुदायों की भागीदारी समाज में आपसी भाईचारे और संतुलन को मजबूत करती है।इसके अतिरिक्त, ये आयोजन स्थानीय स्तर पर नए और युवा नेतृत्व को अपनी सांगठनिक क्षमता दिखाने का एक बड़ा मंच प्रदान करते हैं। आयोजन समितियों में शामिल होने और व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के प्रयास में युवा कार्यकर्ता सीधे जनता की समस्याओं से जुड़ते हैं, जो अंततः लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर और मजबूत बनाता है।संक्षेप में कहा जाए तो, आगरा में त्योहारों के इर्द-गिर्द घूमने वाली यह राजनीतिक हलचल विध्वंसात्मक नहीं, बल्कि सृजनात्मक है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब राजनीति लोक-उत्सवों से जुड़ती है, तो वह केवल भाषणों तक सीमित न रहकर धरातल पर बदलाव का माध्यम बनती है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और सामाजिक समरसता की इस सकारात्मक होड़ को केवल आयोजन के दिनों तक ही सीमित न रखकर, पूरे वर्ष और शहर के हर कोने तक विस्तारित किया जाए, ताकि उत्सवों से उपजी यह ऊर्जा आगरा के समग्र विकास की स्थायी पहचान बन सके।














