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नेक मोहम्मद खां आज सुपुर्द-ए-खाक हो गए रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

स्मृति शेष: नेक मोहम्मद खां

 

आज बस्ती जनपद बहादुरपुर ब्लाक अंतर्गत बनकटा-देवनापुर गांव की मिट्टी ही नहीं, पूरा क्षेत्र गमगीन है। हमेशा सफेद धोती-कुर्ता और कंधे पर अंगौछा रखने वाले, हमारे बड़े मामा नेक मोहम्मद खां आज सुपुर्द-ए-खाक हो गए। उनके जाने के साथ ही सादगी, नरमदिली और पुरानी रस्मों को जीने वाले एक युग का अवसान हो गया।

 

कल शाम लगभग 4 बजे गुरु वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज, कैली में उन्होंने आखिरी सांस ली। बनकटा-देवनापुर की परिधि में बसे एकमात्र मुस्लिम परिवार के वो सबसे बड़े स्तंभ थे। उनके इंतकाल की खबर फैलते ही गांव-जवार में शोक की लहर दौड़ गई, हर किसी की आंख नम हो गई, क्योंकि मामा जीती जागती इंसानियत के मिसाल थे।

 

अपने नाम के अनुरूप ही वे सच में बेहद नेकदिल थे। हमेशा नजरें नीची रखकर चलने वाले, धीरे-धीरे मीठी बोली में बात करने वाले। हमने कभी उन्हें किसी से ऊंची आवाज में, किसी से नाराज होते नहीं देखा। बारहों महीना पैदल चलने वाले मामा में गजब का सब्र था।

 

मामा एक अनोखी परम्परा के हामी थे, जिसका राज वही जानें। आज तक, किसी भी मौसम में, किसी भी त्यौहार में, हमारे पैतृक गांव पूरा पिरई (नकहा) अपनी बहन के घर – उन्होंने कभी एक बूंद पानी तक नहीं पिया, खाने की तो बात ही छोड़ दीजिए। हम लोग जब जिद करते तो वह हमेशा मुस्कुराकर टाल देते। क्या कहें उनके उसूल ही ऐसे थे। आज पुरानी यादें सोंचकर दिल बैठ जाता है।

 

दो दिन पहले ही हम लंबे अरसे बाद ननिहाल गए थे। हमें पहचान नहीं पाए और जब पहचाना तो फफककर खूब रोये। उनके रोने की अभी भी कानों में तैर रही है। यह उम्मीद नहीं थी कि यही आखिरी मुलाकात नसीब है ।

 

मामा जी, आपकी अभी जाने की उम्र नहीं थी। आपका यूं चले जाना बहुत खल रहा है।

ख़ुदा आपको आला दरजात अता करे और बच्चों को ये गहरा सदमा बर्दाश्त करने का सब्र दे।

-शाह आलम राना

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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