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‘गैरचिरागी’ गाँव की गूँज: 169 साल बाद भी इंसाफ के इंतजार में महुआ डाबर, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

‘गैरचिरागी’ गाँव की गूँज: 169 साल बाद भी इंसाफ के इंतजार में महुआ डाबर

बस्ती: जिले के बहादुरपुर ब्लॉक के मनोरमा नदी तट पर शुक्रवार को भावुक और ऐतिहासिक लम्हा देखने को मिला। महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से ‘महुआ डाबर जनसंहार स्मृति दिवस’ के अवसर पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के हजारों ज्ञात-अज्ञात शहीदों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए गए। इस मौके पर उपस्थित लोगों ने महुआ डाबर के बलिदान को याद करते हुए न्याय और सम्मान की मांग दोहराई।

इतिहासकारों के अनुसार 3 जुलाई 1857 को अंग्रेजी फौजों ने बस्ती के महुआ डाबर गाँव को तीन तरफ से घेरकर हजारों निर्दोष स्त्री, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चों का निर्मम कत्लेआम किया था। इसके बाद पूरे गाँव को आग के हवाले कर ‘गैरचिरागी’ यानी ‘बिना चिराग वाला गाँव’ घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश रिकॉर्ड में दर्ज है कि इस कार्रवाई के बाद महुआ डाबर का नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटा दिया गया था।

महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक और शहीद जफर अली के वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि 1857 की क्रांति का यह सबसे बड़ा जनसंहार इतिहास के पन्नों से ओझल है। उन्होंने कहा कि महुआ डाबर के शहीदों का बलिदान संख्या और क्रूरता—दोनों में जलियांवाला बाग से बड़ा है, फिर भी स्कूली पाठ्यक्रमों की किताबों में इसका जिक्र तक नहीं है।

डॉ. राना ने मांग की कि भारत सरकार 3 जुलाई को ‘महुआ डाबर बलिदान दिवस’ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर घोषित करे। उन्होंने कहा कि 10 एकड़ में गौरवशाली और जीवंत शहीद स्मारक, पार्क, सभागार, अतिथिगृह, लाइट एंड साउंड शो के साथ ‘शहादत कॉरिडोर’ बनाकर इसे विश्व पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए। साथ ही यूपी बोर्ड और NCERT की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास की पुस्तकों में ‘महुआ डाबर जनसंहार’ का विस्तृत अध्याय जोड़ा जाए।

उन्होंने यह भी मांग की कि संसद में विशेष बिल लाकर 1857 के शहीद परिवारों का पुनर्वास और सम्मान सुनिश्चित किया जाए। ब्रिटिश सरकार से आधिकारिक माफी की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि रॉयल ट्रेजरी में रखी महुआ डाबर से लूटी गई धरोहरें भारत को वापस की जाएं। इसके अलावा 1857 में अंग्रेजों का साथ देने वाले गद्दारों की संपत्तियों को ‘शत्रु सम्पत्ति अधिनियम’ की तर्ज पर जब्त किया जाए।

महुआ डाबर संग्रहालय के प्रयासों से यह शहीद स्थल उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति 2022 के ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में शामिल हुआ था। तत्कालीन सरकार ने 10 एकड़ में गौरवशाली स्मारक बनाने का ऐलान भी किया था, लेकिन चार साल बीतने के बाद भी एक ईंट तक नहीं रखी गई। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने इसे शहीदों के साथ अन्याय बताते हुए जल्द से जल्द वादे पूरे करने की मांग की है।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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